ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context५४ [ प्रथम पञ्चिका यह मंत्र घी लगाने के लिये उपयुक्त है। जिसमें रूप-समृद्धता होती है वही मंत्र यज्ञ की क्रिया के लिये अधिक उपयुक्त होता है। पतङ्गमक्तमसुरस्य मायया हृदा पश्यन्ति मनसा विपश्चितः। समुद्रे अन्तः कवयो विचक्षते मरीचीनां पदमिच्छन्ति वेधसः ॥ (ऋ० १०।१७७।१) यो नः सनुत्यो अभिदासदग्ने यो अन्तरो मित्रमहो वनुष्यात्। तम- जरेभिर्वृ'षभिस्तव स्वैस्तपा तपिष्ठ तपसा तपस्वान्। (ऋ० ६।५।४) भवा नो अग्ने सुमना उपेतौ सखेव सख्ये पितरेव साधुः। पुरुद्रुहो हि क्षितयो जनानां प्रति प्रतीचीर्दहतादरातीः। (ऋ० ३।१।२१) इनमें पहली और दूसरी ऋचायें उपयुक्त हैं। जो रूप-समृद्ध है वही यज्ञ में सिद्ध है। नीचे की पाँच ऋचायें राक्षस को मारने के लिये हैं। कृणुष्व पाजः प्रसितिं न पृथ्वीं याहि राजेवामवां इभेन। तृष्वीमनु प्रसितिं द्रूणानोऽस्तासि विध्यरक्षसस्तपिष्ठैः ॥ (ऋ० ४।४।१ तव भ्रमास आशुया पतन्त्यनु स्पृश धृषता शोशुचानः। तपूंष्यग्ने जुह्वा पतङ्गानसंदितो विसृज विष्वगुल्काः ॥ (ऋ० ४।४।२) प्रतिस्पशो विसृज तूर्णितमो भवा पायुर्विशो अस्या अदब्धः। यो नो दूरे अघशंसो यो अन्त्यग्ने माकिष्टे व्यथिरा दधर्षीत् ॥ (ऋ० ४।४।३) उदग्नेतिष्ठ प्रत्यातनुष्व न्यमित्राँ ओषतात्तिग्महेते। यो नो अरातिं समिधान चक्रे नीचा तं धक्ष्यतसं न शुष्कम् ॥ (ऋ० ४।४।४) ऊर्ध्वो भव प्रति विध्याध्यस्मदाविष्कृणुष्व दैव्यान्यग्ने। अव स्थिरा तनुहि यातुजूनां जामिमजामिं प्रमृणीहि शत्रून् ॥ (ऋ० ४।४।५) परि त्वा गिर्वणो गिर इमा भवन्तु विश्वतः। वृद्धायुमनु वृद्धयो जुष्टा भवन्तु जुष्टयः ॥ (ऋ० १।१०।१२)