ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextचौथा अध्याय ] ६१ अब वह इस मन्त्र को पढ़ता है :- अरूरुचदुषसः पृश्निरग्रिय उक्षा बिभर्त्ति भुवनानि वाजयुः। माया- विनो ममिरे अस्य मायया नृचक्षसः पितरो गर्भमा दधुः ॥ (ऋ० ६।८२।३) इस मंत्र में 'रुच' अर्थात् प्रकाश का वर्णन है। इस लिये इसको पढ़ कर वह प्रवर्ग्य को प्रकाश युक्त करता है। अब वह नीचे के मंत्र से समाप्त करता है :- द्युभिरक्तुभिः परि पातमस्मानरिष्टेभिरश्विना सौभगेभिः । तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः ॥ (ऋ० १।११२।२५) इसमें “अरिष्टेभि.....पृथिवी उत द्यौः" शब्द आये हैं। इनसे वह प्रवर्ग्य के लिये जो कुछ चाहिये उस सब से उसको युक्त कर देता है। यह प्रवर्ग्य के लिये मन्त्रों का पहला भाग हुआ । (४) २२-प्रवर्ग्य के अन्तिम मन्त्र यह हैं :- उप ह्वये सुदुघां धेनुमेतां सुहस्तो गोधुगुत दोहदेनाम् । श्रेष्ठं सवं सविता साविषन्नोऽभीद्धो घर्मस्तदु षु प्र वोचम् ॥ ( ऋ० १।१६४।२६ ) हिङ् कृण्वती वसुपत्नी वसूनां वत्समिच्छन्ती मनसाभ्यागात् । दुहामश्विभ्यां पयो अघ्न्ये सा वर्धतां महते सौभगाय ॥ (ऋ० १।१६४।२७) अभि त्वा देव सवितरीशानं वार्याणाम् । सदावन् भागमीमहे । ( ऋ० १।२४।३ ) समी वत्सं न मातृभिः सृजता गयसाधनम् । देवान्यं मदमभि द्विशवसम् ॥ ( ऋ० ६।१०४।२ ) सं वत्स इव मातृभिरिन्दुहिन्वानो अज्यते । देवावीर्मदो मतिभिः परिष्कृतः ॥ ( ऋ० ६।१०५।२ )