ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextचौथा अध्याय ] ६९ “तानूनप्त्रम्” (शरीरों को जोड़ना) है । इसीलिये कहावत है कि जो कोई 'तानूनप्त्रम्' से युक्त होता है उसे कोई हानि नहीं होती । इस लिये असुर उनके राज्य को नहीं जीत पाये । (७) २५—'आतिथ्य इष्टि' यज्ञ का सिर है, 'उपसद्' गर्दन है । दो कुश बराबर होते हैं क्योंकि सिर और गर्दन बराबर हुआ करते हैं। देवों ने 'उपसद्' से बाण का काम लिया । अग्नि उस बाण का अनीक (अगला भाग) था, सोम लोहे वाला भाग (शल्य), विष्णु नौक (तेजन) और वरुण पर्ण या तीर का पंख । देवों ने आज्य-रूपी इस बाण को छोड़ दिया और इससे असुरों के दुर्गों को तोड़ कर उनमें घुस गये । आज्य आहुति में यही चार देव होते हैं। यजमान पहले (गाय के) चार स्तनों से दूध पीने का कृत्य करता है क्योंकि उपसद्-सम्बन्धी बाण के चार भाग होते हैं, अनीक, शल्य, तेजन और पर्ण । फिर वह तीन थनों से पान करने का कृत्य करता है क्योंकि उपसद्-सम्बन्धी बाण के तीन भाग होते हैं अनीक, शल्य और तेजन । फिर दो थनों का व्रत करता है क्योंकि उपसद् सम्बन्धी बाण में दो भाग हैं अनीक और शल्य । फिर वह एक थन का व्रत करता है क्योंकि उपसद् सम्बन्धी एक ही बाण होता है। एकता से ही तो काम चलता है। कुल ऊपर जो लोक हैं वह विस्तृत हैं । जो नीचे हैं वह सिकुड़े हुए । उतने थनों से आरंभ करता है जो विस्तृत लोकों के सूचक हैं और क्रम से घटता है। इतना इन लोकों के लिये हुआ । (अब पूर्वाह्न और अपराह्न उपसद् कृत्य में सामिधेनियों का वर्णन है) । (१) उपसद्याय मीळ्हुष आस्ये जुहुता हविः । यो नो नेदिष्ठमाप्यम् ॥ (ऋ० ७।१५।१)