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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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पाँचवाँ अध्याय ] ७७ अग्नि देवों का होता है। उत्तरवेदी की नाभि ही उसका अपना लोक है। 'साद्या यज्ञं सुकृतस्य योनौ' में यजमान ही यज्ञ है। इसलिये यजमान के लिये आशीर्वाद है। "देवावीर्देवान् हविषा यजात्याग्ने बृहद् यजमाने वयो धा' में प्राण ही वयः है। ऐसा कह कर यजमान में प्राण धारण कराता है। अब होता नीचे का मन्त्र पढ़ता है :- निहोता होतृषदने विदानस्त्वेधो दीदिवाँ असदत्सुदक्षः । अदब्ध व्रत प्रमतिर्वसिष्ठः सहस्रम्भरः शुचिजिह्वो अग्निः ॥ (ऋ० २।६।१) [ ज्ञानवान्, प्रकाशवान्, और दक्ष होता होतृ के स्थान में बैठा। वह होता अग्नि कैसा है ? अदब्धव्रतप्रमति (उचित व्रतों का जानने वाला), वसिष्ठ (उत्तम), सहस्रंभर (हज़ारों का पोषण करने वाला), शुचिजिह्वः (चमकदार जीभ वाला]। अग्नि देवों का होता है। उत्तर वेदी की जो नाभि है वह उसका बैठने का स्थान है। 'बैठ गया' से तात्पर्य है कि 'वह रख दिया गया'। 'उचित व्रत का जानने वाला और उत्तम' से तात्पर्य है कि देवों का अग्नि वसिष्ठ अर्थात् उत्तम है। 'सहस्र भर' का अर्थ है कि यद्यपि अग्नि एक है तो भी भिन्न २ अवसरों पर प्रयुक्त होने के कारण उसमें बहुत्व हो जाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह हज़ारों का लाभ पाता है। नीचे का मंत्र पढ़ कर समाप्त करता है :- त्वं दूतस्त्वमु नः परस्पास्त्वं वस्य आ वृषभप्रचेता । अग्ने तोकस्य नस्तने तनूनामप्रयुच्छन्दीद्यद्बोधि गोपाः ॥ (ऋ० २।६।२) (तू हमारा दूत है। तू हमारा पीछे भी रक्षक है। हे बलवान्, तू धन का लाने वाला है। हे अग्नि, हमारे घराने के फैलने में शरीरों की रक्षा में असावधानी न कर। चमकने वाला गोप जागता था)।

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