ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context८० [ प्रथम पञ्चिक है “भद्रा शक्तिः” इत्यादि से यजमान के लिये आशीर्वाद देता है। अब वह विश्वरूपी ऋचा पढ़ता है विश्वा रूपाणि प्रति मुञ्चते कविः प्रासावीद् भद्रं द्विपदे चतुष्पदे । वि नाकमख्यत् सविता वरेण्योऽनु प्रयाणमुषसो विराजति ॥ ( ऋ० ५।८१।२ ) इस मंत्र को रराटी की ओर देखते हुए पढ़ना चाहिये, ( रराटी दर्भ की माला है जो हविर्धान के बीच के खंभों पर लटकी रहता है —ले० )। क्योंकि इस रराटी पर ही सफेद ओर काली सभी तरह की चीजें टंगी रहती हैं। जो इस रहस्य को समझ कर रराटी की ओर देखते हुये मंत्र को बोलता है वह अपने लिये और यजमान के लिये हर एक प्रकार की चीज सम्पादित कर लेता है। इस मंत्र को पढ़ कर समाप्त करता है। परि त्वा गिर्वणो गिर इमा भवन्तु विश्वतः । वृद्धायुमनु वृद्धयो जुष्टा भवन्तु जुष्टयः ॥ ( ऋ० १।१०।१२ ) इस मंत्र को तब पढ़े जब दोनों हविर्धानों को दर्भ के गुच्छे से ढका हुआ मान ले। जो इस रहस्य को समझ कर दोनों हविर्धानों के ढक जाने पर इस मंत्र को पढ़ता है वह अपने और यजमान के लिये ओढ़ी पहनी हुई स्त्रियों का ( जो नंगी न हों ) सम्पादन करता है। दोनों हविर्धान यजु-मंत्र से ढके जाते हैं। अध्वर्यु इस यजु से इस प्रकार ढकते हैं। जब अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता दोनों ओर से मेथी ( एक प्रकार की लकड़ियां ) चलावें तब समाप्त करना चाहिये। क्योंकि तभी दोनों हविर्धान बन्द होते हैं। यह आठ ऋचायें जो बोली गईं रूप-समृद्ध हैं। जो रूप-समृद्ध होती हैं अर्थात् जिनमें उसी बात का विधान होता है। जो क्रिया की जाती है उसी से यज्ञ में सफलता होती है। इनमें से पहले और पिछले