अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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कर मेरे हिस्से का लाल अपनी भाभी को देकर उसे छिपाकर रखने के लिये भलीभाँति समझा देना। मैं लौटकर उससे अपना लाल ले लूँगा। फूलचन्द अपने बड़े भाई का आज्ञापालक था, उन लालों को सावधानी से कमर में छिपाकर घर का रास्ता लिया। घर पहुँचकर माया की चक्कर में पड़ गया और रूपचन्द के भाग का लाल अपनी भाभी को नहीं दिया, बल्कि उन दोनों लालों को अपने ही पास छिपा कर रख लिया। पैसे के जोर से नगर में एक दूकान खोलकर जौहरी बन बैठा। जब रूपचन्द दो तीन वर्षों के पश्चात् चक्कर लगाता हुआ घर पहुँचा और अपनी स्त्री से लाल माँगा तो वह बोली-"कैसा लाल और किस ने कब मुझे दिया था, जो मैं सहेज कर रखती। स्त्री से ऐसा निरास उत्तर सुनकर रूपचंदने फूलचन्द से पूछा- "क्यों भाई मेरा लाल कहाँ है?" फूलचन्द ने उत्तर दिया "भैया वह लाल तो मैं आते ही भाभी को सौंप दिया था, बल्कि उसे भली भाँति समझा भी दिया था कि देखो भैया के आने पर इसे उन्हें सौंप देना। जान पड़ता है कि अब लालच में पड़कर वह उसे आपको देना नहीं चाहती है। जिस कारण आप से झूठा बोल रही है।" रूपचन्द को भाई के ऐसे उत्तर से बड़ा क्रोध उत्पन्न हुआ और घर आकर अपनी स्त्री को बहुत मारा पीटा, परन्तु फिर भी उसने अपने को निर्दोषी बतलाया। वह बोली-"लाल पाना तो बड़ी दूर की बात है; मैं तो इतना भी नहीं जानती कि लाल कैसा