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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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अकबर बीरबल विनोद १४६ “महाशय जी ! क्या आप कृपा कर मुझे बीरबल के घर का पता बतला सकते हैं ?” बीरबल ने कहा-“क्यों नहीं बतला सकता ।” तब वह उसको अपने घर का पता ठिकाना बतला कर वहाँ से चलता हुआ । वह मनुष्य पूछता २ बीरबल के घर जा पहुँचा और उसके घरवालों से बीरबल से मिलने का अनुरोध किया । वे बोले-“ताऊजी अभी बाहर गये हैं, ठहर जाओ थोड़ी देर में मुलाकात हो जायगी । वह आदमी बीर- बल के द्वार पर बैठकर उसके आने की प्रतीक्षा करने लगा । थोड़ी देर बाद बीरबल लौटकर आया, वह उसे पहचान कर आश्चर्यचकित होकर पूछा-‘दीवान जी ! रास्ते में आपसे मेरी मुलाकात हुई थी, परन्तु वहाँ पर आपने मुझे अपना परिचय क्यों नहीं दिया ।” बीरबल ने कहा-“आपका कहना अक्षरसः सत्य है, परन्तु आपने मुझसे बीरबल के घर का पता पूछा था । इसलिये मैंने अपने घर का पता बतला दिया, यदि मेरा परिचय पूछे होते तो मैं आपको अपना परिचय देता ।” उस आदमी ने कहा-“लोगोंके मुखसे मैंने ऐसा सुना है कि आप नित्यप्रति अपना थोड़ा समय एकान्त बास में बिताते हैं, सो उसका क्या कारण है ?” बीरबल बोला-“आपको समझना चाहिये था कि एकान्तबास से बड़ा लाभ होता है। अव्वल तो एकान्त बास में विचारों की सूझ भलीभाँति होती है, दोयम एकान्त मनन करने का सर्वोत्कृष्ट साधन है। यदि आप कहीं अलग बैठकर विचार करेंगे तो आपको अपनी परिस्थिति और की और ही देख पड़ेगी ।” वह मनुष्य बीरबल के उत्तर से संतुष्ट होकर अपने घर लौट गया ।