अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in context१७७ अकबर बीरबल विनोद नहीं बल्कि नितान्त असम्भव है। अब बीरबल की जान नहीं बच सकती, परन्तु बीरबल ने कुछ जवाब नहीं दिया । वह चुपचाप बैठा रहा । नाव किनारे पर आ लगी । घर लौटते समय बादशाह ने उस जगह अपने सिपाहियों की पहरा चौकी बाँध दी ताकि बीरबल किसी प्रकार उस अँगूठी को जल से बाहर न निकाल सके । बीरबल प्रारब्ध के भरोसे चुप्पी साधकर बैठा रहा। जब सत्ताइस दिन व्यतीय हो गये तो बादशाह ने बीरबल से पूछा-“ क्यों बीरबल अँगूठी मिली ?' बीरबल ने इन्कार किया। तब बादशाह ने कहा--“देखो बीरबल ! अब भी उद्योग की प्रधानता स्वीकार करलो मैं तुम्हें माफी दे दूँगा।” बीरबल ने उत्तर दिया-“पृथ्वीनाथ ! भाग्य के सामने उद्योग नहीं टिक सकता, मशल मशहूर है-“घड़ी में घर जले नौ घड़ी भद्रा ।” अभी तीन दिन का समय और है इतने में तो कितना उलट फेर हो सकता है।” बादशाह के क्रोध रूपी अग्नि में और भी आहुति पड़ गई, वह एक दम क्रोधित हो गये । जब अवधि का दिन बीत गया तो चौथे दिन फिर बादशाहने बीरबलसे अपनी अँगूठी माँगी । बीरबल ने कहा-“पृथ्वीनाथ ! मेरे भाग्यसे अँगूठी नहीं मिली।” बादशाह क्रोधित होकर बोला- “तबमरने के लिये प्रस्तुत हो जाओ।” बीरबल तो पहले से ही कमर कस चुका था, वह बादशाहके सामने निर्भय खड़ा हो गया । उसकी मुस्कें कसकर बाँध दी गईं । बीरबल की दशापर बादशाह को फिर तरस आ गई और बोले-“बीरबल ! अब भी मौक़ा है, तुम उद्योग की प्रधानता स्वीकार कर लो, मैं तुम्हें १२