अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in context१८४ अकबर बीरबल विनोद इतना ही नहीं उनको अच्छी चौकसी के लिये छिपेतौर से कुछ अधिक वेतन भी देती थीं और उन्हें हुक्म दे रखा था कि कोई भी मर्द महल के भीतर प्रवेश न करने पाये। जो काम बादशाह के करने का था वह सब रुक गया। बाहर बाहर से कितने ही राजदूत आये, परन्तु उन्हें गद्दी खाली मिली। इस घटना को देखकर वे बहुत ही चकराये इधर नगर निवासियों के चेहरे पर भी कालिमा का पर्दा पड़ने लगा। आज नौ दस महीने से बादशाह का गुम हो जाना बड़े आश्चर्य की बात थी। धीरे धीरे लोगों का विचार पल्टा खाने लगा। वे अपनी मनमानी करने पर उद्यत हुए। दरबारियों को गुप्तचरों के जरिये सारी बातें विदित हो जाती थीं, इसलिये उन्हें भय था कि कहीं बाहरी राजदूत कोई नया फसाद न खड़ा करदें। बीरबल ने सोचा कि अब बिना बादशाह का पता लगाये अच्छा न होगा। अतएव इसका भार बीरबल ने अपने ही सिर उठाया। मुख्य-मुख्य सभासदों की एक प्राइवेट गोष्ठी हुई। सबको संबोधन कर बीरबल बोला-“मित्रों! अब राजका काम सँभ- लते नहीं दीखता है, कारण कि बादशाह के गायब हो जाने का समाचार दूर देशों तक फैल चुका है बाहरी राजदूत टंटा फानने पर उद्यत दिखाई पड़ते हैं। ईश्वर न करे कि कहीं से शत्रुओं की चढ़ाई हो जाय; नहीं तो अपने उद्धार में बड़ी अड़चन पड़ेगी। ऐसी स्थिति में एक ही शत्रु नहीं होते बल्कि राज्य के लोभ से जो लोग मित्र रहते हैं वे भी सत्रु बनकर चढ़ाई करने पर उद्यत हो जाते हैं। फिर इस