अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in context१६७ अकबर बीरबल विनोद भेजकर चुपके से बीरबल को महल में बुलवाकर अपना सारा हाल कह सुनाया। बीरबल उसे एक गुप्त परामर्श देकर तुरत महल से बाहर आया और फिर दर्बार के कामों को इस ढंग से मौन होकर करने लगा मानो उसे इसकी कुछ खबर ही नहीं। जब थोड़ा दिन ढलने को बाकी रहगया तो बेगम ने कुछ सामानों के अलग अलग कई गट्ठर बाँधकर बादशाह को बुलवाया। जब वे आये तो बेगम ने बहुतेरा अनुनय बिनय किया; परन्तु फिर भी बादशाह का मन पल्टा नहीं खाया। वे बोले-“अब समय नहीं है, सूर्यास्त हो रहा है अतएव अपनी प्यारी सामग्रियों को लेकर फौरन मकान खाली करदो।” बेगम बोली-“स्वामी ! जब आप मुझे त्यागते ही हैं तो मेरी एक अन्तिम प्रार्थना स्वीकार करें। मैं चाहती हूँ कि इस जुदाई के समय मेरे हाथ से एक गिलास शर्बत पान करलें। अब जब मेरा सौभाग्य कहीं फिर से उदय होगा तब न मुझे आपका दर्शन मिलेगा।” स्त्रियों की मोहनी भी क्या है, बादशाह बेगम के जाल में फँस गया। बेगम एक प्याले में खूब अच्छी सराब भर लाई और बाद- शाह को अपने हाथों से पिला दिया। थोड़ी देर में बादशाह शराब की नशे में ऊँघने लगा। बेगम पहले ही से अपने नौकर को सावधान कर चुकी थी, वे बादशाह को ले जाकर एक पालकी में सुला दिया। फिर बेगम भी एक दूसरी पालकी में सवार होकर बादशाह के सहित अपने पीहर चली गई। वह बादशाह को एक पलँग पर सुलाकर आप स्वयं उसकी पहरेदारी करने लगी। दूसरे दिन जब बादशाह की नींद