अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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उससे बची हुई लकड़ियों का मूल्य दर्याफ्त किया; फिर पैसा देने के मिस से उसको अपने घर लिवा ले गया। लकड़ो का मूल्य देकर बीरबल ने लकड़हारे से पूछा—"क्यों जी लकड़हारे! तुम हमें कोई सभ्य पुरुष जान पड़ते हो। समय के फेर से इस समय लकड़ियां बेचकर अपनी गुजर करते हो। मेरा तुमसे एक जरूरी काम है। यदि तुम उसके करने पर उद्यत होजावो तो मैं तत्काल तुम्हें पचीस रुपये दूँ। काम हो जाने पर तुम्हारी गुजर माफिक काफी रुपये दूँगा।" लकड़हारे ने मनमें सोचा—"यदि नहीं करूँगा तो यह दीवान है जबरन बेगार में करावेगा। बेहतर है, कि इसकी राजी करूँ तिसपर रुपये भी काफी देनेको कहता है। मनमें ऐसा ठहरा कर वह बीरबल से बोला—"मैं आपकी छोटीसे छोटी आज्ञाएँ पालन करने के लिये तत्पर हूँ, आपकी सभी आज्ञाएँ मुझे स्वी- कार होंगी।" बीरबल ने कहा—"अच्छा मैं तुम्हें कुछ कपड़े देता हूँ; इन्हें धारण कर हनुमान जी के मन्दिर के पिछवाड़े वाली कोठरी में जा बैठो, हाथ में माला लेकर बराबर जपते रहो। किसी की तरफ आँख उठाकर भी न देखना। तुमसे मिलने के लिये बहुत से अमीर उमराव आवेंगे। मुमकिन है स्वयं बादशाह भी आवें, परन्तु उनसे भी कदापि न बोलना। रुपयों के ढेर दें तब भी उधर नहीं देखना। देखो सावधान, मैं यहीं पर किसी जगह छिपकर तुम्हारी सारी बातें देखता रहूँगा, यदि मेरे कहने से जरा भी खिलाफ चलोगे तो तुम्हारी गरदन मार दी जावेगी।" बूढ़े लकड़हारे ने दृढ़ता पूर्वक उसकी आज्ञाओं का पालन करना स्वीकार किया।