अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in contextअकबर बीरबल विनोद २६२ की सड़कें और उच्च अट्टालिकाओं की उपमा दिल्ली नगर से कहीं बढ़ चढ़ कर थी। राजा बड़ा दयालु साहसी और प्रजावत्सल था, ऐसे राजा के सुशासन में प्रजा बड़ी खुश- हाल थी। क्या मजाल कि कोई सबल किसी निर्बल पर प्रहार करे, शेर बकरी एक घाट पानी पीते थे। विशेष कहना बाक्य चातुरी दिखलाना होगा। वहाँ हर तरह से राम राज्य था। राज्य वर्ग के कर्मचारी बड़े धर्मपरायण और ईमानदार थे। घूस खोरी कत्तई बन्द थी, सिफारिश करने वाला स्वयं दंडिए किया जाता था। ऐसी सुन्दर नगरी की सुन्दर व्य- वस्था को देखते सुनते तानसेन और बीरबल चले जारहे थे। इनकी उत्तम २ पोशाकों को देखकर वहाँ के निवासी उन्हें उच्च बंशीय समझ कर उनका सब जगह स्वागत करते थे। वे राज सभा को पूछते हुए नगर में चले जा रहे थे कि इसी बीच चोबदार ने पूछा-"आप लोंगों का यहाँ आना किस निमित्त हुआ है और आपका कहाँ से शुभ आगमन हुआ है।" बीरबल बोला-"हम दिल्ली के निवासी हैं। बादशाह का पत्र लेकर यहाँ के राजा से मिलने आये हैं।" इनका आशय समझ- कर चोबदार इन्हें राजा सभा में ले गया। और ड्योढ़ी पर ठहरा कर आप राजा के पास जाकर इनके आने की सूचना दी। राजाज्ञा प्राप्तकर वह इन दोनों को महाराज के सन्निकट पहुँचा दिया। ये बड़े अदबसे सलाम कर महाराज की आज्ञा से वहींएक स्थान पर बैठ गये। जब महाराज राजकीय कामों को खतम करके निश्चित हुए तो इनके आनेका कारण पूछा। बीर- बल कुछ उत्तर न देकर बादशाह का दिया हुआ पत्र महराज