अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in contextअकबर बीरबल बिनोद १८ दो पड़ोसिनें । दिल्ली शहर के एक महल्ले में दो पड़ोसिनें बहुत दिनों से आबाद थीं, परन्तु दोनों का स्वभाव भेद से उनकी पटरी नहीं खाती थी । उसमें एक तो गुणवती और सरल स्वभाव थी परन्तु दूसरी खोटी और कर्कशा थी । उनके मनमुटाव का यही खास कारण था । न वह उसकी विभूति को सहन करती और न वह उसकी । यहाँ तक कि कर्कशा हमेशा सरला की हँसी उड़ाया करती थी । जब वह किसी प्रकार भी सरला को न दबा सकी तो एक दिन उसने अपने लाड़ले पुत्र की हत्या कर चुपके से उस भलामानस के घर में छोड़ आई और आप स्वयं रोती बिलबिलाती हुई बादशाह के पास पहुँची । जब बीरबल ने उसके बच्चे के कत्ल का हाल सुना तो वह उस भलीमानस औरत को बुलवाया, जिसपर की दुष्टाने अपने पुत्र के मारने का अभियोग लगाया था । बीरबल की आज्ञा पर वह तुरत हाजिर हुई और अपने को इस प्रकार आकस्मिक बुलाये जाने का कारण पूछा । बीरबल ने उत्तर दिया-“क्या तूने इस औरत के बालक की हत्या की है जैसा कि यह तेरे ऊपर अभिशाप लगा रही है ? यदि नहीं, तो तेरे पास निर्दोष होने का क्या सबूत है, तुरत बतला ?” वह बोली-“महाशय जी ! न जाने कौन इस बालक की हत्या कर लाश मेरे घर में डाल गया है । मुझे इसकी बिल्कुल जानकारी नहीं। आप इसपर भलीभाँति विचार करें, मुझे