अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in context२१ अकबर बीरबल बिनोद से बोला—"क्या तुमको इतनी भी तमीज न हुई कि यह समय दरबार का नहीं है, ऐसे मनबहलाव के समय बन्दियों का लाना कहाँ तक उचित था। ये कैदी रातभर हवालात में रक्खे जा सकते थे। कल्ह दरबार लगने पर इनके मामले पर विचार किया जा सकता था, फिर इतनी आतुरता दिखलाने का क्या कारण है ?" बादशाह की नाराजगी से कोतवाल सहम गया, परन्तु बिना असलियत बतलाये भी काम नहीं चलते देखा। कुछ सोच समझकर उसने कहा-“गरीबपरवर ! इसमें सन्देह नहीं कि मैं इनको सुबह लेकर हाजिर हो सकता था परन्तु इनका मामला बड़ा बेढंगा है जिस कारण मुझको विवश होकर इसी समय आना पड़ा।" उससे ऐसा सुनकर बादशाह कुछ शान्त होकर बोला-“अच्छी बात है ! इनका अभियोग सुनाओ।” कोतवाल ने कहा-“आज जब मैं नगर में गस्त लगाते हुए व्यापारियों की मंडी में पहुँचा तो क्या देखता हूँ कि एक जगह बहुतेरे आदमियों की भीड़ लगी हुई है, जब वहाँ गया तो इस अपरिचित मनुष्य को इस नगर व्यापारी से मार पीट करते देखा। यह अपरिचित मनुष्य नगर व्यापारी को झिड़क रहा था कि-“अरे दुष्ट ! आज से पाँच सात वर्ष पहले तू मेरा दास था और वहाँ से छिप कर भाग आया है। बड़े परिश्रम के बाद आज तुझे पकड़ लिया है, अब मेरे रुपये अदा कर । इसको झिड़कते देख नगर व्यापारी बोला-“नालायक ! दास तो मेरा तू है तुझे मैं आज कितने ही वर्षों से ढूँढ़ रहा था, भाग्यवश इससमय हाथ