BharatKosha
अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

Page 51 of 292

Read in context
Page 51

३७ अकबर बीरबल बिनोद सुखपूर्वक बीतता है, मेरी सेवा के लिये अप्सरायें नियुक्त हुई हैं। सर्वदा खाने को उत्तमोत्तम पदार्थ और पान करने के लिये अमृत प्रस्तुत रहता है।" बीरबल की ऐसी बातें सुन बादशाह ने पूछा—"तो ऐसे आनन्द उपभोग को छोड़कर तुम्हारा यहाँ आना कैसे हुआ ?" बीरबल ने बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया—"पृथ्वीनाथ ! आप हमारे पुराने अन्न दाता हैं, यह स्मरण कर इन्द्र से मुहलत लेकर आपसे मिलने आया हूँ, आपके किये हुए उपकार मेरे हृदय-पट पर अंकित हैं इसीलिये आपके निमित्त स्वर्गलोक से एक उत्तम महल और एक परी साथ लाया हूँ। उपरोक्त दोनों चीजें यहाँ से थोड़ी दूर एक पहाड़ी पर छोड़ आया हूँ, यदि आप यहाँ तक चलने का कष्ट करें तो मैं उन्हें आप को दिखला दूँ। बीरबल की बातें बादशाह को सच्ची जान पड़ीं। उसने मनमें अनुमान किया—"जब बीरबल मर गया था तो बिना प्रयोजनके हुये लौटकर कैसे आया, और आया भी तो परी और महल इसके हाथ कैसे लगा। निःसन्देह बीरबल सत्य कहता है ! उन चीजों की परीक्षा के लिये नये दीवान और कुछ अन्य प्रतिष्ठित लोगों को उसके साथ भेजा। बीरबल सबके साथ२ चलकर उस पहाड़ीके समीप जापहुँचा और उन लोगोंको दूर से अँगुली का इशारा करके बोला—"देखो वह सातवें खंड पर बैठी हुई परी हम लोगों की तरफ ध्यानपूर्वक देख रही है। अधिक आदमियों को एक साथ अपने ही तरफ आते देखकर उसे ताज्जुब हो रहा है, उसका चन्द्रमुख कैसा चमक रहा है?