अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in context७६ अकबर बीरबल विनोद ले गया। वहाँ जाकर देखा तो उसके कमरे की सारी चीजें इधर उधर बिखरी पड़ी हैं, सन्दूक काताला भी खुला हुआ है। बादशाह तुरत ताड़ गया कि इसी को चुराने के लिये बीर- बल अकेले में यहाँ आया था, परन्तु फिर भी इतने ही से उसे शान्ति न मिली। उसने विचारा कि यह तो हुई यहाँ की बात, रास्ते में बीरबल अंटसंट क्यों बतलाता था ? तब वह बोला-“बीरबल ! मालूम होता है आज तुम कुछ नशा खा गये हो; नहीं तो ऐसी ऊटपटांग बातें कभी न करते। तुम्हारी काँख तले शराब की बोतल मौजूद थी फिर भी तुमने उसे बैल, गदहा आदि आदि कैसे बतलाया ।” बीरबल को अपना राज बादशाह पर खोलने का मौका मिल गया और उसे इस ढंग से प्रगट करना प्रारम्भ किया-“पृथिवीनाथ ! न तो मैं नशा खाये हूँ और न मेरी बुद्धि ही भ्रष्ट हुई है, मैंने जो कुछ भी कहा है वह मेरे काँख तले थी।”-“अच्छा हुजूर सुनिये-“पहले पहल मैंने आप से बतलाया था कि कुछ भी नहीं है, सो मद्यपान के प्रथम प्याले की बात थी, उस समय बात करनेवाला कुछ भी नहीं देखता। दूसरी बार मेरी जबान पर तोते का नाम आपने सुना होगा। इसका अभिप्राय यह था कि दूसरा प्याला पीलेनेपर मनुष्य तोते के समान बकने लगता है। फिर मैंने घोड़े का नाम लिया था। उसके मानी यह था कि तीसरा प्याला पी चुकने पर मद्यपी घोड़े के समान हिनहिनाना प्रारम्भ कर देता है। चौथी बार हाथी बतलाया था। सो इस कारण कि चौथे प्याले के सेवन के पश्चात् मद्यपी मस्त