आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
by बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय
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Read in context‘‘हरे मुरारे मधुकैटभारे!‘‘........ इसके बाद ही उसका कंठ क्रमशः निस्तब्ध होने लगा, कल्याणी के मुंह से अब शब्द नही निकलता- आंखें ढंक गई, अंग शीतल हो गए। महेंद्र समझ गए कि कल्याणी ने ‘‘हरे मुरारे‘‘ कहते हुए बैकुंठ प्रयाण किया। इसके बाद ही पागलों की तरह उच्च स्वर से वन को कम्पित करते हुए पशु-पक्षियों को चौंकाते हुए महेंद्र पुकारने लगे- ‘‘हरे मुरारे मधुकैटभारे!‘‘........ इसी समय किसी ने आकर उनका अलिंगन किया और उसी स्वर मे वह भी कहने लगा- ‘‘हरे मुरारे मधुकैटभारे!‘‘........ तब उस अनंत ईश्वर की महिमा से, उस अनंत वन में अनंत पथगामी शरीर के सामने दोनो जन अनंत नाम- स्मरण करने लगे। पशु-पक्षी नीरव थे, पृथ्वी अपूर्व शोभामयी थी- इस परम पावन गीत के उपयुक्त मंदिर था वह। सत्यानंद महेंद्र को बांहो मे संभाल कर बैठ गए। इधर राजधानी की शाही राहो पर बड़ी हलचल उपस्थित हो गई। शोर मचने लगा कि नवाब के यहां से जो खजाना कलकत्ते आ रहा था, संन्यासियों ने मानकर सब छीन लिया। राजाज्ञा से सिपाही और बल्लमटेर संन्यासियो को पकड़ने के लिए छूटे। उस समय दुर्भिक्ष-पीड़ित प्रदेश मे वास्तविक संन्यासी रह ही न गए थे। कारण, वे लोग भिक्षाजीवी ठहरे, जनता स्वयं खाने को नही पाती तो उन्हे वह कैसे दे सकती है? अतएव जो असली संन्यासी भिक्षुक थे, वे लोग पेट की ज्वाला से व्याकुल होकर काशी-प्रयाग चले गए थे। आज ये हलचल देखकर कितनो ने ही अपना संन्यासी वेष त्याग दिया। राज्य के भूखे सैनिक, संन्यासियो को न पाकर घर-घरमे तलाशी लेकर खाने और पेट भरने लगे। केवल सत्यानन्द ने किसी तरह भी अपने गैरिक वस्त्रो का परित्याग न किया। उसी कल्लोलवाहिनी नदी-तट पर, शाही राह के बगल मे पही पेड़ के नीचे कल्याणी पड़ी हुई है। महेंद्र और सत्यानंद परस्पर अलिंगनबद्ध होकर आंसू बहाते हुए भगवन्नाम-उच्चारण मे लगे हुए हैं। उसी समय एक जमादार सिपाहियो का दल लिए हुए वहां पहुंच गया। संन्यासी के गले पर एक बारगी हाथ ले जाकर जमादार बोला-‘‘यह साला संन्यासी है!‘‘ इसी तरह एक दूसरे ने महेंद्र को पकड़ा। कारण, जो संन्यासी का साथी है वह अवश्य संन्यासी होगा। तीसरा एक सैनिक घास पर पड़े हुए कल्याणी के शरीर की तरफ लपका- उसने देखा की औरत मरी हुई है, संन्यासी न होने पर भी हो सकती है। उसने उसे छोड़ दिया। बालिका को भी यही सोच कर उसने छोड़ दिया। इसके बाद उन सबने और कुछ न कहा, तुरंत बांध लिया और ले चले दोनो जन को। कल्याणी की मृत देह और कन्या बिना रक्षक के पेड़ के नीचे पड़ी रही। पहले तो शोक से अभिभूत और ईश्वर के प्रेम मे उन्मत्त हुए महेंद्र प्रायः विचेतन अवस्था मे थे- क्या हो रहा था, क्या हुआ- इसे वह कुछ समझ न सके। बंधन मे भी उन्होने कोई आपत्ति न की। लेकिन दो-चार कदम अग्रसर होते ही वे समझ गए कि ये सब मुझे बांध लिए जा रहे हैं- कल्याणी का शरीर पड़ा हुआ है, उसका अंतिम संस्कार नही हुआ- कन्या भी पड़ी हुई है। इस अवस्था मे उन्हे हिंस्र पशु खा जा सकते हैं। मन मे यह भाव आते ही महेंद्र के शरीर मे बल आ गया और उन्होने कलाइयो को मरोड़कर बंधन को तोड़ डाला। फिर पास मे चलते जमादार को इस जोर की लात लगायी कि वह लुड़कता हुआ दस हाथ दूर चला गया। तब उन्होने पास के एक सिपाही को उठाकर फेका। लेकिन इसी समय पीछे के तीन सिपाहियो ने उन्हे पकड़कर फिर विवश कर दिया। इस पर दुःख से कातर होकर महेंद्र ने संन्यासी से