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आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

by बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय

DevanagariHindipublished78 pages

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जीवानंद-‘‘ग्रहण करूंगा-शांति! मैंने क्या तुम्हे त्याग दिया है?’’ शांति-‘‘त्याग नही, जब तुम्हारा व्रत पूरा होगा, जब तुम फिर मुझे प्यार करोगे........’’ बात समाप्त होने के पहले ही जीवानंद ने शांति के छाती से लगा लिया और उसके कंधो पर माथा रख बहुत देर तक चुप रहे। इसके बाद एक ठंडी सांस लेकर बोले-‘‘क्यो मुलाकात की?’’ शांति -‘‘क्या तुम्हारा व्रत भंग हो गया?’’ जीवानंद-‘‘हो व्रत भंग, उसका प्रायश्चित भी है। उसके लिए शोक नही है। लेकिन तुम्हे देखकर तो फिर लौटते नही बन पड़ता। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और सारा संसार, व्रत-होम, योग-यज्ञ यह सब एक तरफ है और दूसरी तरफ तुम हो। मैं किसी तरह भी समझ नही पाता हूं कि कौन-सा पलड़ा भारी है? देश तो अशांत है, मैं देश लेकर क्या करूंगा। तुम्हारे साथ एक बीघा भूमि लेकर भी बड़े आनंद से मेरा जीवन बीत सकता है। तुम्हे लेकर मैं स्वर्ग गढ़ सकता हूं। क्या करना है मुझे देश लेकर? देश की उस संतान का अभाग्य है जो तुम्हारी जैसी गृहलक्ष्मी प्राप्त कर भी सुखी हो न सके। मुझसे बढ़कर देश में कौन दुःखी होगा? तुम्हारे शरीर पर ऐसा कपड़ा देखकर मुझे लोग देश मे सबसे दरिद्र ही समझेगे। मेरे सारे धर्मों की सहायता तो तुम हो उसके सामने फिर सनातन-धर्म क्या है? मैं किस धर्म के लिए देश-देश, वन-वन बंदूक कंधे पर लेकर प्राणी-हत्या कर इस पाप का भार संग्रह करूं? पृथ्वी संतानो की होगी या नही, कौन जानता है? लेकिन तुम मेरी हो- तुम पृथ्वी से भी बड़ी हो- तुम्ही मेरा स्वर्ग हो। चलो घर चले, अब वापस न जाऊंगा!’’ शांति कुछ देर तक बोल न सकी। इसके बाद बोली-‘‘छीः! तुम वीर हो-मुझे इस पृथ्वी पर सबसे बड़ा सुख यही हैं कि मैं वीर-पत्नी हूं! तुम अधम स्त्री के लिए वीर-धर्म का परित्याग करोगे? तुम अपने वीर-धर्म का कभी परित्याग न करना! देखो मुझे एक बात बताते जाओ, इस व्रत के भंग का प्रायश्चित क्या है?’’ जीवानंद ने कहा-‘‘प्रायश्चित है-दान, उपवास-12 कानी कौड़ियां।’’ शांति मुस्कराई और बोली-‘‘जो प्रायश्चित हैं मैं जानती हूं। लेकिन एक अपराध पर जो प्रायश्चित है- वही क्या शत अपराधो पर भी है?’’ जीवानंद ने विस्मित और विवश होकर कहा-‘‘लेकिन यह सब क्यो पूछती हो?’’ शांति-‘‘एक भिक्षा है। कहो- मेरे साथ बिना मुलाकात किए प्रायश्चित न करोगे!’’ जीवानंद हंसकर कहा-‘‘इस बारे में निश्चित रहो- बिना तुम्हे देखे, मैं न मरूंगा। मरने की ऐसी कोई जल्दी भी नही है। अब मैं अधिक यहां न ठहरूँगा, लेकिन आंख भरकर तुम्हे देख न सका। फिर भी एक दिन अवश्य देखूंगा। एक दिन हम लोगो के मन की कामना जरूर पूरी होगी! मैं अब चला तुम मेरे एक अनुरोध की रक्षा करना- इस वेश-भूषा का त्याग कर दो। मेरे पैतृक मकान मे जाकर रहो।’’ शांति ने पूछा-‘‘इस समय कहां जाओगे?’’ जीवानंद-‘‘इस समय मठ में ब्रह्मचारीजी की खोज में जाऊंगा। वे जिस भाव से नगर गए है, उससे कुछ चिंता होती है। मठ मे मुलाकात न हुई तो नगर जाऊंगा।’’ भवानंद मठ मे बैठे हुए हरिगान मे तल्लीन थे, ऐसे ही समय दुःखी चेहरे से ज्ञानानन्द नामक एक तेजस्वी संतान उनके पास आ पहुंचे। भवानंद ने कहा-‘‘गोस्वामी! चेहरा इतना उतरा हुआ क्यो है?’’ ज्ञानानंद ने कहा-‘‘कुछ गड़बड़ी जान पड़ती है। कल के कांड से सरकारी आदमी जिसे हल्दी-गेरुआ वस्त्रधारी देखते हैं, उसे गिरफ्तार कर लेते है। करीब-करीब सभी संतानो ने आज अपना गैरिक वस्त्र उतार दिया है। केवल सत्यानंद प्रभु गेरुवा पहने हुए ही शहर की तरफ गए है। कौन जाने कही मुसलमानो के हाथ पड़ जाए!’’ भवानंद बोले-‘‘उन्हे बंदी कर रखे, बंगाल में अभी ऐसा कोई मुसलमान नही है। मैं जानता हूं, धीरानंद उसके