अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextसाहिब और धर्मदास
पुरुष अवाज उठी तिहि बारा । ज्ञानी बेग जाहु संसारा ॥ जीवन काज अंश पठवायी । सुकृत अंश जग प्रगटे जायी ॥ दीन्ह आज्ञा तेहि को भाई । शब्द भेद वाही समझायी ॥ लावहु जीवन नाम अधारा । जीवन खेड़ उतारो पारा ॥ सुनत आज्ञा वहि कीन पयाना । बहु रि न आये देश अमाना ॥ सुकृत भवसागर चलि गयऊ । काल जाल ते सुधि बिसरयऊ ॥ तिन कहँ जाय चितावहु ज्ञानी । जेहिते पंथ चले निरवानी ॥ बंस ब्यालिस अंस हमारा । सुकृत गृह लैहँ औतारा ॥ ज्ञानी बेगि जाहु तुम अंसा । अब सुकृत अंश कर मेटहु फंसा ॥
तो कहा कि तब हम परम पुरुष की आज्ञा से तुम्हारे पास आए । धर्मदास तुम सुकृत अंशा । जा कारण हम कीन्ह बहु संसा ॥ पुरुषहिं आज्ञा तुम्हरे ढिग आये । पिछली हेत पुनि याद कराये ॥ दश औतार ईश्वरी माया । यह सब देख काल की छाया ॥ तुम जग जीव चितावन आये । काल फन्द तुम आई फँसाये ॥ अबहुँ चेत करो धर्मदासा । पुरुषहिं शब्द करो परकासा ॥ ले परवाना जीव चिताओ । काल जाल ते हँस मुक्ताओ ॥
साहिब ने कहा-हे धर्मदास ! तुम मेरे अंश हो, परम पुरुष ने तुम्हें जीवों को चिताने संसार में भेजा था, पर तुम काल के फँदे में फँस गये और भूल गये । अब नाम लो और जीवों को चिताओ ।
धर्मदास ने पूछा
कलियुग केर कहो परभाऊ । और हँस परमोधेउ काठ ॥ सो मोहि वरण कहो गुरु देवा । कौन जीव कीन्ही तुम सेवा ॥
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