BharatKosha
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

by लौगाक्षि भास्कर

DevanagariHindipublished84 pages

Page 80 of 84

Read in context
Page 80

७४ अर्थसंग्रहः— मिति बोधयता सर्ववेदस्य प्रयोजनवदर्थपर्यवसायित्वं सूचयतोपात्तत्वेना- नर्थक्यानुपपत्तेः । प्राशस्त्य अथवा निन्दा-परक वाक्यको अर्थवाद कहते हैं। जहां पर 'वायु- र्वै क्षेपिष्ठा'—इत्यादि अर्थवाद वाक्य स्थलमें प्राशस्त्य अथवा निन्दा बोधक वाक्य नहीं है वहां पर भी लक्षणासे प्रयोजनवाला अर्थका बोधक होगा । क्योंकि अर्थ- वाद वाक्यका स्वार्थ प्रतिपादनमें कोई प्रयोजन नहीं रहता है । अतः विधि वाक्यको विधेयके प्राशस्त्यमें और निषेधको निषेध्यकी निन्दामें लक्षणा होती है । केवल स्वार्थमात्रका प्रतिपादन करनेसे व्यर्थ हो जायगा । क्योंकि समस्त वेदोंको क्रियाका प्रतिपादक मानते हैं इसलिए सिद्धार्थका प्रतिपादन द्वारा स्वार्थमात्रपरक मानकर चरितार्थ करना उचित नहीं है । वैयर्थ्यकी इष्टा- पत्ति नहीं कर सकते हैं क्योंकि 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' यह अध्ययन विधि सारे वेदोंके अध्ययनकर्तव्यको समझाती हुई सकल वेदोंको प्रयोजनवदर्थपरक कहती है इसलिए अनर्थक नहीं हो सकता है । अर्थवादविभागः । स द्विविधः —विधिशेषो निषेधशेषश्चेति । तत्र 'वायव्यं श्वेतमालभेत भूतिकाम' इत्यादिविधिशेषस्य 'वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवते'त्यादेर्विधेयार्थप्राश- स्त्यबोधकतयार्थवत्त्वम् । 'बर्हिषि रजतं न देय'मित्यादिनिषेधशेषस्य, 'सोऽरोदीद्यदरोदीत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वमि'त्यादेर्निषेध्यस्य निन्दितत्वबोधकतया- र्थवत्त्वम् । न च प्राशस्त्यादिबोधस्य निष्प्रयोजनत्वेन नार्थवादस्यार्थवत्त्व- मिति वाच्यम् । आलस्यादिवशादप्रवर्तमानस्य पुंसः प्रवृत्त्यादिजनकत्वेन तद्बोधस्योपयोगात् । अर्थवादके दो भेद हैं विधि शेष और निषेध शेष । उनमें 'वायव्यं श्वेत- मालभेत भूतिकामः' इस विधिका शेष 'वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता' इत्यादि मंत्र है । वह मंत्र विधेय भूत उक्त यज्ञादि कर्म रूप अर्थमें प्राशस्त्यका लक्षणासे बोधन द्वारा प्रवर्तक होनेसे सार्थक होता है । अर्थात् वायु (क्षेपिष्ठा) शीघ्र चलने वाले देवता हैं अतः वायु देवता निमित्तक कर्म अत्यन्त प्रशस्त है इस तरह बोध होनेसे श्रेष्ठजनों की उसमें प्रवृत्ति होती है । 'बर्हिषि रजतं न देयम्' इत्यादि निषेधका शेष (सोऽरोदीत्) इत्यादि है । यह लक्षणासे निषेध्य रजतादि की निन्दाका बोधन द्वारा सार्थक होता है । प्राशस्त्यादि बोधनका कोई प्रयोजन