बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)
Bawan Kasni
by सद्गुरु मधु परमहंस जी
Source: Sant Ashram Ranjari 2015 Edition · Sant Ashram Ranjari, Samba (J&K)
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Read in context120 साहिब बन्दगी
वेद हमारा भेद है, हम वेदन के माहिं। जौन भेद में मैं बसौ, वेदै जानत नाहिं॥
कुरान शरीफ कह रहा है ‘बेचूना खुदा’। बेचूना अर्थात् निराकार। ईसा मसीह भी कह रहे हैं मेरा आकाशी पिता (स्वर्गीय पिता) मैं उसका एकलौता पुत्र हूँ। अकाशी पिता अर्थात् निराकार। वेद भी निराकार की बात कह रहा है। जेजे दृश्यम तेते अनित्यम्। जेजे अदृश्यम तेते नित्यम्। यानि निराकार। हमारे सभी धार्मिक ग्रन्थ भी निराकार तक की बात कहते हैं। भाईयों यह निराकार सत्ता वाला जिसको लोग रब्ब कहते हैं, वह 84 लाख योनियों का रचनहार है जो तत्वों में आकाश तत्व है परन्तु योनियों को चेतन करने वाली जो ऊर्जा है सुरति है वो कोई और चीज़ है तभी तो इस सिरजनहार निराकार को कबीर साहिब जी बोल रहे हैं।
मन ही निराकार, निरंजन जानिए॥ गुप्त भयो है संग सबके। मन निरंजन जानिये॥ निराकार जो वेद बखाने। सोई काल कोई भेद न जाने॥
मुक्ति से सबका तात्पर्य निराकार की प्राप्ति। साहिब बन्दगी पंथ किसी की निन्दा नहीं करता। निराकार सत्ता को भी स्वीकार करता है, लेकिन आगे की बात का संकेत भी देता है। संत सम्राट् कबीर साहिब जी ने न्यारा कहा और निराकार सत्ता से आगे कहा। सगुण भक्ति, निर्गुण भक्ति अथवा पाँच मुद्राओं से आगे कहा।
इसके आगे भेद हमारा। जानेगा कोई जाननहारा॥ कहे कबीर जानेगा सोई। जा पर दया सतगुरु की होई॥
संतों ने आ कर तीन लोक से आगे परम निर्माण, अमर धाम, सत्य लोक अथवा दसवें द्वार से आगे 11वें द्वार का भेद संसार को दिया।
भाईयों साहिब बन्दगी पंथ भी काल पुरुष के काया नाम और अमर लोक के विदेह नाम का अंतर समझा कर संसार को सत्य भक्ति की ओर ले जा रहा है।
काग पलट हंसा कर दीना। ऐसा पुरुष नाम मैं दीना॥ अकह नाम, लिखा न जाई, पढ़ा न जाई। बिन सतगुरु कोई नाहि पाई॥