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बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)

बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)

Bawan Kasni

by सद्गुरु मधु परमहंस जी

Source: Sant Ashram Ranjari 2015 Edition · Sant Ashram Ranjari, Samba (J&K)

Devanagarihipublished122 pages

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22 साहिब बन्दगी

(4) साहिब जी को तलवार से मरवाने का प्रयास

राज गुरु पीर शेख तकी द्वारा साहिब को दी जा रही यात्नाओं से बादशाह बहुत दुखी था पर राजा का शेख तकी को रोकना कठिन था। क्योंकि वो राजा का धर्मगुरु और वज़ीर भी था। साहिब ने भी बादशाह से यह कह दिया था कि इसे अपनी इच्छा से जो चाहे करने दो, मत रोको। क्रोध से भरा शेख तकी साहिब को देग़ में डालकर न जला सका तो उसकी क्रोधाग्नि चरम सीमा तक पहुँच गयी थी। क्रोध मनुष्य को सब कुछ भुला देता है। उचित-अनुचित का उसे कोई बोद्ध नहीं रहता है। वो अपना आपा भी भूल जाता है। यही हाल तकी का भी हो गया था, क्रोध में आकर उसने अपनी तलवार उठाई और साहिब को मारने चल पढ़ा। उसके साथियों ने उसे रोकने का बड़ा प्रयास किया; कहा कि आपको यह काम शोभा नहीं देता। आप यह काम किसी ओर से करवा लें। पर वो नहीं माना और खुद ही तलवार लेकर साहिब के पास आया और उन पर अँधाधुंध वार करने लगा। शेख तकी यह देख हैरान रह गया कि उसकी तलवार साहिब का कुछ नहीं बिगाड़ पा रही थी। वो साहिब के शरीर पर बिना कोई घाव किये इस तरह आर-पार होती जा रही थी मानो वो वायु में तलवार चला रहा हो। तलवार चलाते-चलाते आख़िर में जब वो थक गया तो लज्जित होकर वहाँ से मुँह नीचा करके चला गया। साहिब का शरीर तो केवल देखने मात्र के लिए था। वास्तव में तो उनका कोई शरीर था ही नहीं वो तो शब्द स्वरूपी थे।

हाथ में ले तलवार, पीर अंधाधुंध चलाये।
हर एक वार तलवार का, आर-पार हो जाये॥
पीर थक कर हार गया, अपना मुख छुपाये।
लज्जित होकर चल दिया, साहिब रहा, मुस्काये॥

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