भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५४१
हल्दी, मिरच, दाख, पुराना गुड, रायसन, पीपल और कचूर इन सब ओषधियोंके समान भाग चूर्णको सरसोंके तैलमें मिलाकर सेवन करनेसे प्राणनाशक श्वास रोगभी दूर होता है ॥ २५ ॥
शृङ्ग्यादिचूर्ण । शृङ्गीकटुत्रिकफलत्रयकण्टकारी भार्ङ्गी सपुष्करजटा लवणानि पञ्च । चूर्णं पिबेदशिशिरेण जलेन हिक्का- श्वासोर्ध्ववातकसना रुचिपीनसेषु ॥ २६ ॥ काकडासिंगी, सोंठ, पीपल, मिरच, हरड, बहेडा, आमला, कटेरी, भारंगी, पोहकरमूल, जटामांसी और पाँचों नमक इन सबके समान भाग मिश्रित चूर्णको गरम जलके साथ सेवन करनेसे हिचकी, श्वास, ऊर्ध्ववात, खाँसी, अरुचि और पनिस आदि रोगोंमें विशेष लाभ होता है ॥ २६ ॥
विजयवटी । सूतकं गन्धकं लौहं विषमभ्रकमेव च । विडङ्गं रेणुकं मुस्तमेलाग्रन्थिककेशरम् ॥ २७ ॥ त्रिकटु त्रिफला शुल्बभस्म जैपालचित्रकम् । एतानि समभागानि द्विगुणो दीयते गुडः ॥ २८ ॥ कासे श्वासे क्षये गुल्मे प्रमेहे विषमज्वरे । सूतायां ग्रहणीदोषे शूले पाण्ड्वामये तथा । हस्तपादादिदाहेषु वटिकेयं प्रशस्यते ॥ २९ ॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लोहभस्म, शुद्ध मीठा तेलिया, अभ्रकभस्म, वायविडङ्ग, रेणुका, नागरमोथा, छोटी इलायची, पीपलामूल, नागकेशर, त्रिकुटा, त्रिफला, ताम्रभस्म, शुद्ध जमाल गोटा और चीता इन सब ओषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । फिर सब चूर्णसे दुगुना पुराना गुड लेकर सबको एकत्र खरल करके गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंको खाँसी, श्वास, क्षय, गुल्म, प्रमेह, विषमज्वर, प्रसूतारोग, संग्रहणी, शूल, पाण्डुरोग, हाथ पाँवकी दाह आदि विकारोंमें व्यवहार करना चाहिये ॥ २७–२९ ॥
डामरेश्वराभ्र । मेचकं पलमितं मृतमभ्रं ब्रह्मयष्टिकणकामृतवासाः । कासमर्द्दवननिम्बकचव्यं ग्रन्थिकं दहनमूलसमेतम् ॥ ३० ॥