भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६८९
भक्षितस्य विदाहश्च जठरानलतीक्ष्णता ।
रक्तप्रवृत्तिर्विड़्भेदः पुरीषस्योष्णता तथा ॥
मूत्रोष्णता मूत्रकृच्छ्रं शुक्राल्पत्वं तनूष्णता ॥ ५ ॥
स्वेदस्यापि च दौर्गन्ध्यं देहप्रावरणं तथा ।
शरीरस्यावसादश्च पाकश्च वपुषस्तथा ॥ ६ ॥
चत्वारिंशदमी पित्तव्याधयो मुनिदर्शिताः ।
बोद्धव्या स्वप्रकरणे चिकित्सैषां पृथक् पृथक् ॥ ७ ॥
असमयमें बालोंका पकना, नेत्रोंमें लाली और पीलापन, मूत्र और मलका पीत-वर्ण होना, नाखूनोंकी लाली कम होना और पीला पडजाना, दाँतोंका और समस्त शरीरका पीला रङ्ग होना, आँखोंके सामने अन्धेरा आना, मुखमें खट्टापन, निःश्वासवायुका उष्ण होना, गलेमें धुआँसा घुटना, भ्रम, खेद, क्रोध, दाह, दस्तोंका होना, अग्नि और धूपकी तेजी बुरी मालूम होना, शीतोपचारकी इच्छा होना, असन्तोष, किसी कार्य्यमें चित्तका न लगना, भोजन करनेके बाद दाह होना, जठराग्निका तीक्ष्ण होना, रक्तकी वमन और रुधिरके दस्त होना, मलका पतलापन और उष्णताका होना, मूत्रमें उष्णता, मूत्रकृच्छ्र, वीर्य्यकी अल्पता, तरलता और उष्णताका होना, शरीरका गरम रहना, पसीना और शरीरमें दुर्गन्ध आना, देहकी त्वचाका फटना, शरीरकी अवसन्नता और पकना अर्थात् फोड़े फुन्सा आदिका निकलना ये ४० प्रकारकी पित्तकी व्याधियाँ मुनियोंने निर्दिष्ट की हैं। इन सबकी पृथक् पृथक् चिकित्सा मूलरोगाधिकारके अनुसार जाननी चाहिये ॥ १-७ ॥
धात्रीलौह ।
धात्रीचूर्णस्याष्टौ पलानि चत्वारि लौहचूर्णस्य ।
यष्टीमधुकरजश्च द्विपलं दद्यात्पटे घृष्टम् ॥ ८ ॥
धात्र्याः क्वाथेन तच्चूर्णं भव्यं वै सप्तवासरम् ।
चण्डातपेन संशुष्कं भूयः पिष्टं घटे स्थितम् ॥ ९ ॥
घृतेन मधुना युक्तं भोजनाद्यन्तमध्यतः ।
त्रीन्वारान्भक्षयेन्नित्यं पथ्यं दोषानुबन्धतः ॥ १० ॥
भक्तस्यादौ नाशयेच्च दोषान् पित्तकृतानपि ।
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