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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

by महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास)

DevanagariHindipublished638 pages

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२१ नक्षत्रों के नाम क्रमशः निम्नानुसार हैं— | १ अश्विनी | ८ पुष्य | १५ स्वाति | २२ श्रवण | | २ भरणी | ९ अश्लेषा | १६ विशाखा | २३ धनिष्ठा | | ३ कृत्तिका | १० मघा | १७ अनुराधा | २४ शतभिषा | | ४ रोहिणी | ११ पूर्वाफाल्गुनी | १८ ज्येष्ठा | २५ पूर्वाभाद्रपद | | ५ मृगशिरा | १२ उत्तराफाल्गुनी | १९ मूल | २६ उत्तराभाद्रपद | | ६ आर्द्रा | १३ हस्त | २० पूर्वाषाढ़ा | २७ रेवती | | ७ पुनर्वसु | १४ चित्रा | २१ उत्तराषाढ़ा | | उत्तराषाढ़ा की अन्तिम १५ घटी तथा श्रवण नक्षत्र की पहली ४ घड़ी— इस प्रकार कुल १९ घड़ी का एक नक्षत्र 'अभिजित्' भी माना जाता है। 'अभिजित्' सहित नक्षत्रों की कुल संख्या २८ हो जाती है। २८ नक्षत्रों के क्रम में अभिजित २२वाँ नक्षत्र माना जाता है उसके बाद श्रवण से रेवती पर्यन्त क्रमशः २३ से २८ तक की संख्या वाले नक्षत्र माने जाते हैं। नक्षत्रों के स्वामी पूर्वोक्त २८ नक्षत्रों के स्वामी २८ विभिन्न देवता माने गये हैं। जिस देवता का जो स्वभाव है, उसी के अनुरूप नक्षत्र तथा उस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक का स्वभाव भी माना जाता है। विभिन्न नक्षत्रों के स्वामी निम्नानुसार हैं—

नक्षत्रस्वामीनक्षत्रस्वामी
१ अश्विनीअश्विनीकुमार१५ स्वातिपवन
२ भरणीकाल१६ विशाखाशक्राग्नि
३ कृत्तिकाअग्नि१७ अनुराधामित्र
४ रोहिणीब्रह्मा१८ ज्येष्ठाइन्द्र
५ मृगशिराचन्द्रमा१९ मूलनिर्ऋति
६ आर्द्रारुद्र२० पूर्वाषाढ़ाजल
७ पुनर्वसुअदिति२१ उत्तराषाढ़ाविश्वेदेवा
८ पुष्यबृहस्पति२२ अभिजित्ब्रह्मा
९ अश्लेषासर्प२३ श्रवणविष्णु
१० मघापितर२४ धनिष्ठावसु
११ पूर्वाफाल्गुनीभग२५ शतभिषावरुण
१२ उत्तराफाल्गुनीअर्यमा२६ पूर्वाभाद्रपदअजैकपाद
१३ हस्तसूर्य२७ उत्तराभाद्रपदअहिर्बुध्न्य
१४ चित्राविश्वकर्मा२८ रेवतीपूषा