BharatKosha
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

by महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास)

DevanagariHindipublished638 pages

Page 21 of 638

Read in context
Page 21

(२) चन्द्र-यह ग्रह 'शुभ' संज्ञक, पश्चिमोत्तर दिशा का स्वामी, स्त्री जाति, श्वेत वर्ण एवं जलीय प्रकृति का है। यह रक्त का स्वामी तथा वातश्लेष्मा धातु वाला है। इसके द्वारा मन, चित्त वृत्ति, सम्पत्ति, माता, पिता, निरर्थकभ्रमण, राजकीय अनुग्रह, उदर, मस्तिष्क एवं शारीरिक स्वास्थ्य तथा कफज एवं जलीय रोग, स्त्रीजन्य रोग, मानसिक रोग तथा पीनस रोग आदि के विषय में विचार करना चाहिए । यह लग्न से चतुर्थ स्थान में बली तथा मकर से ६ राशियों तक चेष्टा बली होता है । कृष्णपक्ष की षष्ठी से शुक्लपक्ष की दशमी तक बह क्षीण रहता है । इस अवधि में इसे पाप ग्रह तथा क्षीण माना जाता है। शुक्ल पक्ष की दशमी से कृष्ण पक्ष की पंचमी तक यह पूर्ण ज्योतिर्मान्, बली तथा शुभ ग्रह माना है । चतुर्थभाव में बली चन्द्रमा हो पूर्ण फलदायी होता है, क्षीण चन्द्रमा नही । (३) मङ्गल-यह ग्रह 'पाप' संज्ञक, दक्षिण दिशा का स्वामी, पुरुष जाति, रक्त वर्ण, पित्त प्रकृति तथा अग्नि तत्व वाला है। यह उत्तेजक, तृष्णाकारक तथा दुःखदायी है। इसके द्वारा धैर्य, पराक्रम, भाई-बहिन, शक्ति तथा रक्त सम्बन्धी विचार करना चाहिए। यह तीसरे तथा छठे स्थान में बली, दशम स्थान में दिग्बली। चन्द्रमा के साथ चेष्टा बली तथा द्वितीय भाग में बलहीन होता है । (४) बुध-यह ग्रह 'नपुंसक', संज्ञक उत्तर दिया का स्वामी, श्यामवर्ण, त्रिदोष तथा पृथ्वी तत्त्व वाला है। यह व्यवसाय, चिकित्सा, ज्योतिष, शिल्प, कानून, चतुर्थ एवं दशम स्थान का कारक है। इसके द्वारा बुद्धिभ्रम, विवेक, शक्ति, जिह्वा एवं तालु से उच्चारण किये जाने वाले शब्द एवं अवयव तथा गुप्त रोग, श्वेतकुष्ठ, गूंगापन, वातरोग, संग्रहणी आदि का विचार किया जाता है। बुध चतुर्थ स्थान में 'निर्बल' होता है। यह जैसे यह के साथ बैठा हो उसी के स्वभाव का बन कर, शुभ अथवा अशुभ फल देने वाला शुभग्रह अथवा पापग्रह बन जाता है। पूर्ण चन्द्र, बुध तथा शुक्र के साथ शुभ फलदायक तथा सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु के साथ अशुभ फलदाता होता है। यदि यह अकेला हो तो शुभ फल देता है। (५) वृहस्पति-यह ग्रह 'शुभ' संज्ञक, पूर्वोत्तर दिशा का स्वामी, पीतवर्ण तथा आकाश तत्त्व वाला है। यह हृदय की शक्ति का कारक है। इसके द्वारा पारलौकिक सुख, आध्यात्मिक-सुख, घर, विद्या, पुत्र, पौत्र तथा शोथ, गुल्म आदि रोगों का विचार किया जाता है। लग्न में बैठा हुआ वृहस्पति अभी तथा चन्द्रमा के साथ कहीं भी बैठा हुआ चेष्टा-बली होता है।