भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
by महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास)
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Read in context४३ (२) दिग्बल—जन्मकुण्डली में प्रथम भाव की पूर्व, चतुर्थ की उत्तर, सप्तम की पश्चिम तथा दशमभाव को दक्षिण दिशा माना जाता है । गुरु तथा गुरु प्रथमभाव अर्थात् लग्न (पूर्व दिशा) में, चन्द्रमा तथा शुक्र चतुर्थभाव (उत्तर दिशा) में, शनि सप्तमभाव (पश्चिम दिशा) में तथा मंगल दशम- भाव (दक्षिण दिशा) में स्थित हों तो उन्हें 'दिग्बली' माना जाता है। निम्नांकित उदाहरण कुण्डली में दिशाओं तथा दिग्बली ग्रहों की स्थिति को प्रदर्शित किया गया है—
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| २ \ पूर्व दिशा / १२ |
| \ गु॰-बु॰ / |
| ३ \ १ / ११ |
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| उत्तर दिशा \ / दक्षिण दिशा |
| च॰ शु॰ \ ७ / मं॰ |
| ४ \ शनि॰ / १० |
| \ पश्चिम दिशा / |
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| ५ / \ ९ |
| / \ |
| ६ / \ ८ |
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१८
(३) कालबल—यदि जातक का जन्म रात्रि के समय हुआ हो तो उसकी जन्मकुण्डली के ग्रहों में से (१) चन्द्रमा, (२) मंगल और (३) शनि—ये तीनों ग्रह कालबली होते हैं और यदि जातक का जन्म दिन में हुआ हो तो (१) सूर्य, (२) बुध और (३) शुक्र—ये तीनों ग्रह कालबली होते हैं। मतान्तर में, 'बुध' को दिन-रात्रि दोनों ही समय में कालबली माना जाता है । (४) नैसर्गिक बल—शनि, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, चन्द्र तथा सूर्य—ये ग्रह उत्तरोत्तर एक दूसरे से अधिक बली होते हैं। अर्थात् शनि से मंगल अधिक बलवान होता है, मंगल से बुध, बुध से गुरु, गुरु से शुक्र, शुक्र से चन्द्र तथा चन्द्र से सूर्य अधिक बलवान होता है। इसी क्रम की विपरीत स्थिति में ग्रह एक दूसरे से उत्तरोत्तर कम बलवान होते हैं अर्थात् सूर्य से चन्द्रमा कम बलवान है तथा चन्द्र से शुक्र, शुक्र से गुरु, गुरु से बुध, बुध से मंगल तथा मंगल के शनि कम बली होता है।