बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
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- ६३ - दावद तउ सवाइ १ म्हे चाल्लियां। मू तउ २ धेवा चंदन घरपाइ ३ गात्त ४॥ पहर पटोली ५ चूमड़ी। आढ़ा ६ थाविनइ ७ आपणी ८ बाग॥ पोघउ ९ गाजिनइ मन सण्ड १०। १ पक्त साइ देइ परण्या गजह छागि॥ ८५॥ स्वामी चाल्यय मतउ ११ घायल्ड सुवृण १२। राजनइ १३ चालता वरजइ दुइ १४ कुख १५॥ १ आ० १२ आज सवरैं। २. आ० ६ तो। ३ आ० २ पोल। ४ आ० २ कराडू। ५ आ २ न आछी। ६ आ० १२ आटी। ७. आ० १२ आबिनै। ८. आ० १२ पाकडी। ६ आ० १२ घोषो। १०. आ० १२ भांजिनै मणत नो। यह छंद आ० २ खड २ में ६५, आ० ६ में ६०, आ० १० में ८२ है। किंतु आ० २ में इस छंद की अंतिम दो पंक्तियां नहीं हैं। तीसरी पंक्ति है जो इस प्रकार है—उठी सबारा चालस्या। छठी पंक्ति भी इस छंद की उपर्युक्त छठी पंक्ति से बिलकुल भिन्न है— ६ "गाड़ो रोई गोरी गलिलाई। आठवीं पंक्ति आ० १२ में है— "सकति बाहा देप्यारा गजिला।" ११. आ० १२ मती। १२. आ० १२ नो घालोसी सौण। १३. आ० १२ राइ नै। १४ आ० ६ वरजै, आ० १२ वरजसी। १५. आ० १२ कोख।