बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
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- ६७ - कान नयदा पग दूरि हा। श्यामी सांचह रवि गति सांधीप घात ॥ छलकती फाड़ि¹ बांधी जम दोठ। सुद्धि किरमाणीय दीन्दढढह याठ ॥ सेज² समदीयउ³ सोरठी। चेटी⁴ करी⁵ दाविम किना सियगार ॥ आयुध ले हयपरि चढ्या। सपीउ⁶ उछगाण⁷ चाल्य द्वार ॥ तठइ⁸ तुरीय पछाथीया अंगणह⁹ बाथि। रमरि¹⁰ भवानीथ पडियउ¹¹ बेकाण ॥ पंक्तियां श्र० २ तथा श्र० ६ में नहीं है। तथा आ० १२ में अंतिम दो पंक्तियां हैं— "कान" नैडा पग दूरही। स्वामी थावर विगति सांचीय बात। १. श्र० ६ फढि, आ० १२ फढि। २. श्र० ६ से। ३. श्र० ६ समदीया, आ० १२ समादियो। ४+५. श्र० ६ चटी, श्र० ६ परी, आ० १२ फारी। ६ श्र० ६ सपी, आ० १२ सपी। ७. श्र० ६ उछ्राग, आ० १२ उछगायउ। यह छंद जिस प्रकार श्र० २ में ८६ का दूसरा हिस्सा है उसी प्रकार आ० ६ में भी यह ६४ का दूसरा हिस्सा है। तथा आ० १२ में भी ८५ का दूसरा हिस्सा है। इस छंद की दूसरी पंक्ति आ० १२ में है— 'तुधकिर माणण्दीशे छे गाठ।' ८ श्र० १२ तठे। ९. श्र० १२ आगण। १०. आ० १२ समरि। ११. श्र० ६ चढ्यो।