बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
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- ११२ - घणीय¹ उमाहो² लागिय³। राजा⁴ वरसे⁵ घर⁶ कीय थीव⁷॥१५६॥ घाट पटाउ घर श⁸ पीर। तुम्हे उतरि जायठ⁹ समुद वह खीरि॥ माघण हुई रूद छाणी। साज छोडी¹⁰ तुम्हे शरु हउय तुम्हे यात¹¹॥ उलगणा संयम¹² कहे। थारी मुख ऊमाहो¹³ ऊबडस्या¹⁴ गाल¹⁵॥१५७। १ + २. अ ० घणा उपाही, आ० ६ ण्ण कोई माहिं, आ० १२ घणी उमाहो। ३. अ० २ उलगाइ, आ० १२ लागिस्यै। ४. अ० २ राव, आ० ६ राय, आ०१२ रामाओ। ५. अ० २ चखाओ, आ० ६ चखायो, अ० १२ करिसौ। ६ अ० २ घरा, आ० ६ घर, आ० १२ घरि। ७. अ० २ आ० ६ अचेत, आ० १२ चीन। यह छंद अ० २ खड ३ में २७, आ० ६ खण्ड ३ मे २५, आ० १२ में १४१ है। लेकिन आ० १२ में १ली पक्ति है :- “काती मासहि जयइ चलाइ।" ओर ४ थी पक्ति है -' जिम जिम चालिस्यै तिउ होइसी हेत॥” ८, आ० १२ घणो के। ९. आ० १२ जाहु। १०. आ० १२ लाजाछाडी। ११. आ० १२ तुम्ह कहूँ वान। १२. आ० १२ उलगाणो सुईम। १३ आ० १२ उमाहिउ। १४. आ० १२ ऊखप्पा। १५ आ० १२ गात्र। यह छुद अ० २, आ० ६, आ० ६ में नहीं है। आ० १२ में १४२ है।