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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

DevanagariHindipublished315 pages

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  • ११४ - तायढत¹ गिणे म छाहट्टी । चीरीय² राविउयो जिम घल कयड पीव ॥१५९॥ पाँदूपा मुखि षोलूइ जजमानि³ । रया⁴ घरि उमहह⁵ दौरा कै पाणि ॥ गहे कट्टी मोचिति आणियओ । थे या माहे⁶ पालिजयौ रूहइ साथि⁷ ॥ शाहूभरि रावलि⁸ घया । म्हारौ चीरीन देज्यौ राउ कह हाथि⁹ ॥१६०॥ कोस पयाण¹⁰ दूरे पडीयउ¹¹ जाइ । सात अगा रूढि¹² भई ठठ¹³ पाइ ॥ १. आ० १२ तायह । २. आ० १२ चीरी । यह छंद आ० २ खड ३ मे -६, आ० ६ खड ३ में २७, आ० १० में १४४ है। लेकिन आ० २ में इस छंद की १, २, ३ पक्तियाँ ही हैं तथा आ० ६ में १, ३ हैं, २ नहीं है। आ० ६ की और आ० २ की शेष पक्तियाँ सपत्ति छंदों की १३७ और १४८ में हैं। ३ आ० १२ दोलै जजमनि । ४ आ० १२ या । ५ आ० १२ उमहे । ६ आ० १२ माहि । ७ आ० १२ नीकै साथ । ८ आ० १२ रावल । ९ आ० १२ राव कै हाथि । यह छंद आ० २, आ ६, आ० ६ में नही है। आ० १२ में १४५ है। १० आ० ६ पीयाणा, आ० १२ रे पयाणौ । ११ आ० १२ रे पडियो । १२ आ० ६ करी, आ० १२ कडि । १३ आ० २, आ० ६ बैठो हो, आ० १२ बैठा ।
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