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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

DevanagariHindipublished315 pages

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Page 242

– १५३ – ढलमलंत घरि चलियह। नयण¹ भरहं² चह करइ जुहार॥ फिरिजोये म्हारी वीर यू³। राणी कोटि टका कड दीन्हउ आपैसार⁴॥ म्हारी आवत मह रूपिया⁵। दिढ कड पीदर छह भोज की धारि⁶॥१६६॥ तू रह वीसतू⁷ घरि⁸ न जाइ⁹। धारा¹⁰ करिस्था¹¹ प्यारि वीवाह¹²॥

१ + २ आ० ६ नारणभरथ, आ० १२ नयण भर्या। ३ आ० ६ म्हा का वार सूँ। ४ आ० २ आपीयो। ५ आ० ६ थ साँपिऱ्या। ६ आ० १० राजा भाज की पारि। यह छंद अ० २ खड ३ में ६२, आ० ६ खड ३ म ६०, आ० ६ म २ १ तथा आ० १२ में १८४ है। लेकिन अ० २ और आ० ६ म इसकी ४, ५, ६ टी पक्तियाँ हैं — ४ सह सदेसी नया (सानइया आ० ६) उपरिपान। ५ म्हा वहढा म बावरो। ६ रहो तो उडीसा परधान। ७ अ० २, आ० ६ प्रधान तु, आ० १२ मीसल बोर। ८ अ० २ जी, आ० ६ परहा, आ० १२ (में नहीं है)। ९ अ० २ मतो जाइ, आ० ६ न जाय, आ० ६ म जाइ, आ० १२ जाहि। १० अ० २ थारो। ११ अ० २ कराऊ हू, आ० ६ करु हूं, आ० ६ करेस्या, आ० १२ करिस्थी। १२ अ० २ दोती व्याह, आ० ६ थारो व्याह, आ० ६ च्यारे वीवाह।