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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

DevanagariHindipublished315 pages

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  • १५७ - सुन्दरी भाह हीयदह घड़ी। म्है पठ¹पाणीय पीस्यौ²उथा³अच्छइ जाय⁴॥२३१॥ नयर उडीसा थो घड़इ⁵ राइ। आसणि हयवर छाप पसउ⁶॥ ठकुराआ भये⁷ गणल पइ। तठइ⁸ सुखमणी तुरीय घउरासिया साथि ॥ मज्झि मज्झि गुरी रटीयाइ⁹। उतह¹⁰ दिवम गियाइन गिलइ राति ॥ चोलणता चिति गोरूड़ि बसी¹¹। तठइ धुरि घरवा ढोल¹²नइ झरहरी भेरि ॥ राणा मनिदि आणदीयठ¹³। जब दिठि दीठउ गड़ अजमेर ॥२३०॥ १. आ० १२ (में नहीं है)। २ आ० १२ पीछौ। ३ आ० १२ उथि। ४. आ० १२ जाइ। यह छंद आ० ६ में २३१ तथा आ० १२ में २२५ है। ५. आ० १२ घड़ीयोलै। ६. आ० १२ पसाउ। ७. आ० १२ सथि। ८ आ० १२ (में नहीं है)। ९. आ० ६ पाल्टीयै, आ० १२ पालटै। १० आ० १२ (में नहीं है)। ११. आ० ६ चालता चित्त बसी गोरडी, आ० १२ चालतां चित्ति गोरी बसी। १२. आ० ६ तठै घुरारूया ढोल, आ० १२ घुरद्द्या ढोल। १३. आ० ६ राणामति आनंदीयो, आ० १२ राणामनि आणदीयो। यह छंद आ० ६ में २३२ तथा आ० १२ में २२६ है।