बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
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- १७५ - अकबरी मसजिद में और तीसरा हसन कुली खाँ के बनवाये हुए फव्वारे पर है । “आईन इ अकबरी” आदि ग्रन्थों का रचयिता, अकबर का प्रीतिपात्र अबुल फजल और उसका भाई शेख फैजी नागोर के रहने वाले शेख मुबारक के बेटे थे । शाहजहाँ के समय का एक लेख हि० स० १०४६ ( वि० सं० १६६५ वैशाख सुदि ३ ई० स० १६३८ ता० ७ अप्रेल ) का क़िले के एक मकान में और दूसरा हि० स० १०५६ ( वि० सं० १७०३ : ई० १६४६ ) ताहिर खाँ की मसजिद में है। औरंगजेब के समय के तीन लेख हैं, जिनमें से सबसे पहला हि० स० १०७ ( वि० सं १७७-८ ई० स० ६६०-६१ ) का है। दूसरा हि० स० १०७६ ( वि स० १७२२-२३ ई० स० १६६५-६६ ) का, जिसमे राव अमर सिंह के बेटे राव सिंह द्वारा शनी तालाब बनवाये जाने का उल्लेख है। गुजरात के सुल्तान मुज़फ़्फ़र खाँ ने अपने भाई शम्स खाँ को नागोर की जागीर दी थी, जिसने यहाँ अपने नाम से शम्स तालाब बनवाये । उसके पीछे उसका बेटा फीरोज खाँ वहाँ का स्वामी हुआ जिसने यहाँ एक बड़ी मसजिद बनवाई, जिसको महाराणा कुम्भा ने नगोर विजय करते समय नष्ट कर दिया । जब महाराज अजीत सिंह अपने छोटे पुत्र बख्त सिंह द्वारा मारे गये तो महाराज अभयसिंह ने नागोर की जागीर बख़्त सिंह को दे दी । जनरल कनिंघाम लिखते हैं कि बादशाह औरंगजेब ने जितने मंदिर यहाँ तोडे उनसे अधिक मसजिदें बख्त सिंह ने तोडीं । इसी कारण यहाँ के कई फारसी लेख शहरपनाह की चुनाई में उल्टे-पुल्टे लगे हुए अबतक विद्यमान हैं। टाऊ टोंक राजपूतों का शहर टोंक अजमेर प्रान्त में है । बहुत वर्षों तक यह होल्कर राजाओं के अधीन था । जयपुर से दक्षिण ५० मील की दूरी पर यह अक्षांश २६ १२ उत्तर और ७५ ३८ देशान्तर पूर्व में बसा हुआ है । सन् १८१८ म यह ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत आ गया । गुजरात झेलम से लाहौर जानेवाली सड़क पर चनाव नदी से ६ मील पश्चिम में गुजरात शहर बसा हुआ है । इसका पुराना नाम हैरात था । कनिगघ साहब का अपना मत है कि “हैरात” की उत्पत्ति “अराच” से हुई है ।