बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
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- ३२ - (१) संगीत के लिये वाद्य यन्त्रों की (२) गीतों के लिये वाद्य यन्त्र अनि- अपेक्षा है। वार्य नहीं। (२) संगीत शास्त्रीय विधान के बन्धन से (१) गीत शास्त्रीय विधान के विरोध बद्ध है। में आत्मनिष्ठा का आधार लेकर पनपते हैं। लोक गीत जिस अवस्था में प्राप्त हैं उसमें छन्द और अर्थ दोनों की प्रधा- नता है और आग्रह है संगीतात्मक एवं रागात्मक अनुभूति का, शास्त्रीय संगीत का नहीं। एक विशेषता इन लोक गीतों की यह भी है कि इनका विरोध न केवल शास्त्रीय संगीत से वरन् काव्य के स्वीकृत मानों की कृत्रिमता के प्रति भी है। जो आत्मीयता, आत्मनिष्ठता और संवेदनशीलता उनमें है वह शास्त्रीय काव्य- विधान में नहीं। कुछ पश्चिमी विद्वानों ने भी गीत के उपर्युक्त मानों को स्वीकार करते हुए कहा है :- "गीत काव्य का कवि, जगत् के सारे तत्वों को अपने में समाहित करता है, अपने वैयक्तिक भावों के प्रभाव से इसे पूर्णतः आत्मसात् करता है और इस आत्मपरकता को सुरक्षित रखने वाली शैली में अभिव्यक्ति करता है।" ( टिशोछ—मेथड ऐण्ड मैटीरियल्स ऑव् लिटरेरी क्रिटिसिज्म पृ० ५) [ इसी प्रकार 'पालग्रेव' कहते हैं कि- गीत काव्य इकहरे विचार, अनुभूति या स्थिति का चित्रण है, जिसमें संक्षिप्तता मानवीय भावना का रंग और गति अवश्य होनी चाहिये।" ( पाल्ग्रेव्स गोल्डेन ट्रेजरी ऑव् सांग्स ऐण्ड लिरिक्स—प्रिफेस ) हिन्दी साहित्य में लोक गीतों के जो उदाहरण प्राप्त हैं वे हिन्दी भाषा की विभिन्न 'बोलियों' में ही हैं। इसका प्रधान कारण सम्भवतः एक यही है कि 'बोली' में जितनी सरसता और आत्मीयता पायी जाती है उतनी व्याकरण के नियमों से आबद्ध भाषा में नहीं। लोक गीतों के निम्न कतिपय उदाहरण सहज सिद्ध करेंगे कि काव्य के मानों और शास्त्रीय संगीतों के विधानों की अवहेलना करने पर भी ये गेय हैं और उनमें है सरसता और आत्माभिव्यक्ति। राजपूताने में स्त्रियाँ हवेलियों में गा रही हैं—