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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

DevanagariHindipublished315 pages
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के पश्चात् इनके पिता तथा इनके सभी सगे सम्बन्धी एक पहाड़ी जाति द्वारा मार डाले गए थे। ये एक योगी की कृपा से किसी प्रकार बच गये और जैस- लमेर की स्थापना की। रावल की उपाधि भी इन्हीं के समय से प्रचलित हुई। इनके पूर्वजों के इतिहास से ऐसा ज्ञात होता है कि इस वंश की उत्पत्ति भारत के प्रसिद्ध यदुवंशियों से हुई, जिसके नेता कृष्ण थे। कृष्ण की मृत्यु के पश्चात् 'यदु' जाति विभाजित हो गई और भारत के विभिन्न भागों में जाकर बस गई। इनमें से कृष्ण के दो पुत्र सिन्धु नदी के पार उत्तर दिशा की ओर आकर बस गए। कुछ समय के पश्चात् इन्हीं के वंशजों में से कोई एक किसी लड़ाई में मारा गया और यह जाति पुनः दक्षिण दिशा की ओर चली आई, जहाँ गज के लड़के शालिवाहन ने एक नगर की स्थापना की और धीरे धीरे सारे पंजाब प्रान्त पर अपना आधिपत्य जमा लिया। इसी का प्रपौत्र 'भाटी' नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह बड़ा वीर और योद्धा था। इसने अपने बल और शौर्य से आसपास के राजाओं को जीता और तभी से यदुवंश के लोगों ने अपनी पैतृक उपाधि को छोड़कर इस राजा के नाम की उपाधि को धारण किया। पंजाब प्रान्त में भी यह जाति अपनी सत्ता अधिक काल तक नहीं कायम रख सकी। गजनी के राजा ने इस जाति पर आक्रमण कर इस जाति को दक्षिण दिशा की ओर खदेड़ दिया और इस जाति ने सतलज नदी को पार कर भारत की मरुभूमि में प्रवेश किया। यहाँ ही ये लोग बस गये। यहाँ बस जाने के बाद मुसलमानों के आक्रमणों से इस जाति का बराबर मोर्चा लेना पड़ा। मुसलमानों के आक- मणों के अतिरिक्त इस जाति को राज्य के आसपास की बसी हुई जातियों से भी लड़ना पड़ा। ऐसी लड़ाइयों में सबसे बड़ी लड़ाई इस जाति की 'सोदा' जाति वालों से हुई। ऐसे आक्रमणों तथा नित्य के लड़ाई झगड़ों ने इस जाति को लुटेरा बना दिया। इस जाति का यह स्वभाव देवराज की छठी पीढ़ी में होने वाले राजा जेसल के समय में भी वर्तमान था, जब जैसलनगर और किला पहले से अधिक दृढ़ हो गया था। इस जाति के इस स्वभाव ने इतना आतंक मचाया कि सन् १२९४ में बादशाह अलाउद्दीन को इस जाति को दबाने के लिए शाही सेना भेजनी पड़ी। शाही सेना ने इनके नगर को बिलकुल वीरान बना दिया। इसके पश्चात् रावल सबलसिंह के राजा होने तक की कोई ऐसी घटना नहीं है जो उल्लेख योग्य हो। रावल सबल सिंह, जेसल की पचीसवीं पीढ़ी में हुआ था। इसी ने सर्वप्रथम जैसलमेर के इतिहास में मुसलमानों का आधिपत्य

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  • १८४ - स्वीकार किया । इसके समय दिल्ली का पादशाह शाहजहाँ था । इसने शाहजहाँ का आधिपत्य स्वीकार कर यद्यपि अपने राज्य को दृढ़ बनाया फिर भी राज्य की भाग्य रवि अस्त ही रही, और इसकी सातवीं पीढ़ी में होने वाले राजा रावल मूल राज के समय तो ऐसी टूटी कि इस राज्य ने फिर स्वतन्त्रता का मुँह नहीं देखा । मूलराज जैसलमेर की राजगद्दी पर सन् १७६२ में बैठा था । उसके राज्यकाल में राज्य का सारा प्रबन्ध उसके एक मंत्री सलीम सिंह द्वारा होता था । यह मन्त्री अपने काले कारनामों और अपनी क्रूरता के लिए विख्यात था । अस्तु, राज्य की व्यवस्था उचित रूप में नहीं हुई । सन् १८१८ में इस राज्य के साथ अँगरेज शासकों की सन्धि सम्पन्न हुई । (Rajputana gazetter Vol II P 167) जैसलमेर का नाम प्राचीन शिलालेखों में 'वल्लभटल', वल्लदेश और माड भी मिलता है । यहाँ के लोग इसे अब 'माड' भी कहते हैं । यहाँ की स्त्रियाँ सुन्दर होती हैं । कहा भी जाता है कि — मारवाड़ नर नीपने, नारी जैसलमेर । सिंधी तुरङ्गी सांतरां, करहक बीकानेर ॥ अर्थात् मारवाड़-जोधपुर में पुरुष, जैसलमेर में स्त्रियाँ, सिंध में घोड़े और बीकानेर में ऊँट अच्छे मिलते हैं । 'चम्पावती' यह नगर चम्पावती देवी के नाम पर वहाँ के राजा "साल" के कश्मीर के राजा अनन्त द्वारा ई० सन् १०२८ और १०३१ के बीच मारे जाने पर उसके पुत्र द्वारा बसाया गया था । "चम्पा" के नाम से आज भी यह स्थान काश्मीर प्रान्त में प्रसिद्ध है । "चम्पा" एक बहुत बड़ा जिला है । यह लाहौल और कास्त वार के मध्य रावी और चनाब की घाटी पर बसा हुआ है । ह्वेनस्यांग ने अपने यात्रा-वर्णन में इसका कोई उल्लेख नहीं किया है । जिससे यह सिद्ध होता है कि उस समय यह काश्मीर की हद के भीतर था और इसकी कोई अलग स्थिति नहीं थी । लेकिन कुछ ऐसे ऐतिहासिक चिह्न इस जिले में वर्तमान हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि यह एक पुराना नगर था और इसका अपना अलग स्थिति थी । इस जिले में प्राप्त होने वाले सुन्दर मन्दिरों के समूह तथा आदमकद काँसे का एक साँड इसके प्राचीन राजाओं के धन वैभव के साक्षी हैं । शिला-लेखों में प्राप्त वार्त्ताओं से ज्ञात है कि ये कला की वस्तुएँ ६वीं और १०वीं शताब्दी की हैं । काश्मीर के जातीय इतिहास में इस स्थान का नाम "चम्पा" अनेक स्थानों पर आया है । काश्मीर के राजवंश वाले चम्पा वंश के लोगों के
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  • १८५ - साथ आज भी वैवाहिक सम्बन्ध करते हैं । मुसलमानों के आक्रमण-काल में कुछ समय के लिए यह नगर स्वतन्त्र हो गया था । लेकिन महाराज गुलाब सिंह ने पुनः इसे बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में काश्मीर में मिला लिया था । 'गंगा' समुद्र की सतह से १३८०० फुट की ऊँचाई पर हिमाच्छादित उत्तरी हिमा- लय के गंगोत्री नामक स्थान से गंगा का उद्गम माना जाता है । अपना नाम गंगा धारण करने के पहले ये उत्तर-पश्चिम से आती हुई जाह्नवी और इसके पश्चात् ही अलकनन्दा को भेंटती हैं और तब ये तीनों धाराएँ एक साथ मिल कर गंगा की धारा कहाती हैं । और तब सुखो के पास हिमालय पर्वत को भेदती हुई ये दक्षिण और पश्चिम दिशा में हरिद्वार की ओर घूमती हैं । इस स्थान से ये दक्षिण और दक्षिण पूर्व-उत्तरप्रदेश के मेरठ और रोहिलखण्ड जिलों में प्रवेश करती हैं, और इसके बाद रोहिलखण्ड को आगरा से अलग करती हुई ये फर्रूखाबाद जिले में जाती हैं । इसके बाद अवध की दक्षिण-पश्चिमी सीमा को बनाती हुई ये इलाहाबाद, मिर्जापुर, बनारस तथा गाजीपुर और बलिया के जिलों को बंगाल से अलग करती हैं । इस प्रकार उत्तर-प्रदेश के अनेक नगरों और जिलों की सिंचाई का मुख्य साधन बन कर यह बिहार और बंगाल प्रान्तों की ओर बढ़ती है । २५° ३१' उत्तर और ८३° ५२' पूर्व में ये शाहाबाद जिले में प्रवेश कर इसकी सीमा को निर्धारित करती हुई और इस जिले को उत्तर-प्रदेश से अलग करती हुई उत्तरी छोर पर घाघरा और दक्षिणीछोर पर सोन नदी से मिलती हैं । इसके पश्चात् यह पटना शहर की ओर अग्रसर होती है और नेपाल से आने वाली गंडक को अपनी सहचरी बनाती हैं । फिर पूर्व में यह कोसी से मिलकर राजमहाल पर्वत श्रेणियों को पार करती हुई द्रुत गति से दक्षिण की ओर चलती हैं और बंगाल प्रान्त के गौड़ नगर को पवित्र करती हुई समुद्र से भेंट करने के लिए आगे बढ़ती हैं । इस स्थान से करीब बीस मील की दूरी पर इसकी कई एक शाखाएँ फूटती हैं । इनमें से प्रमुख शाखा "पद्मा" के नाम से प्रसिद्ध है । पद्मा का भीषण रूप हमें वर्षा काल में दिखाई पड़ता है, जब जहाजरानी को भी इसकी तीक्ष्ण धारा को पार करना कठिन हो जाता है । इस प्रकार गंगा २३°१३' उत्तर और ६०°३३' पूर्व में मेघना नदी को योग देती हुई बंगाल में ५४० मील तथा अपने उद्गम स्थान से १५५७ मील की दूरी तै करके समुद्र में प्रवेश करती है ।
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इसके किनारे पर बसे हुए प्रमुख नगर हैं उत्तर प्रदेश में हरिद्वार, मोरों, कानपुर, प्रयाग, मिर्जापुर तथा बनारस, बिहार का पटना एवं बंगाल का कलकत्ता। गंगा का एक या दो अन्य नदियों से मिलन अथवा उसका समुद्र में मिलन हिन्दुओं का तीर्थ स्थान है। प्रयाग में जहाँ यह यमुना और सरस्वती से मिलती है, आज भी कुम्भ पर्व का आयोजन होता है और लाखों नर नारी इस अवसर पर त्रिवेणी की धारा में स्नान कर अपने पापों का क्षय करते हैं। इसी प्रकार बंगाल की खाड़ी में भी जहाँ गंगा समुद्र से मिलती है प्रत्येक वर्ष गंगा सागर का मेला आयोजित होता है और लाखों नर नारियाँ एकत्र होते हैं और गंगा की धारा में स्नान कर पुण्य लाभ करती हैं। वैदिक साहित्य में तो कम लेकिन पुराणों में गंगा की अपार महिमा का वर्णन है। ऐसा कहा जाता है कि सूर्यवंशी राजा सगर ने किसी समय अश्व- मेध यज्ञ आयोजित किया था। यज्ञ में विघ्न डालने की इच्छा से इन्द्र ने राजा सगर के अश्वमेध के घोड़े को पातालपुरी में कपिलदेव मुनि के आश्रम में चुरा दिया। राजा सगर की एक रानी से उत्पन्न साठ हजार पुत्र घोड़े को खोजते खोजते मुनि के आश्रम में पहुँचे और यह समझकर कि मुनि के द्वारा ही यज्ञ का अश्व चुरा कर रख लिया गया है, मुनि के प्रति अपशब्दों का व्यवहार किया और उनके शाप से क्षार हो गये। राजा सगर की दूसरी रानी के पुत्र असमंजस के पुत्र अंशुमान ने गरुड के उपदेशानुसार ब्रह्मलोक से पाताल में अपने पूर्वजों को तारने के लिए गंगा को लाने की अनेक चेष्टा की लेकिन उनकी चेष्टा विफल हुई। अन्त में उनके प्रपौत्र महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ गंगा को पृथ्वी पर लाने में समर्थ हुए और उनके पूर्वज जो ऋषि के शाप से क्षार हो गये थे, गंगा की पावन धारा के स्पर्श होते ही मुक्त हो गए। पौराणिक युग में यदि गंगा की पवित्र धारा ने राजा के साठ हजार पुत्रों का उद्धार किया तो वर्तमान युग भी उनकी धारा से कम लाभ नहीं उठा रहा है। चूँकि भारत कृषिप्रधान देश है इसलिए इसे अन्नादि उपजाने के लिए सदा जल की आवश्यकता रहती है। गंगा की नहरों द्वारा यह कार्य बड़े सुविधापूर्वक हो रहा है। नहर की एक शाखा द्वारा एटा, मैनपुरी, फर्रुखाबाद, इटावा, कानपुर, फतेहपुर, इलाहाबाद जिलों की प्राय ८३२००० एकड़ भूमि सींची जाती है तथा इसकी दूसरी शाखा द्वारा भी प्राय इतने ही एकड़ भूमि सींची जाती है। रेलों की लाइन के बिछने के पहले तथा उसके बाद भी गंगा यातायात का प्रधान साधन रही है।

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  • ३८७ - पुराणों में गंगा के चार नाम और मिलते हैं: - १ सोता, २ अलकनन्दा, ३ चक्षु तथा ४ भद्रा। एक कथा के अनुसार जह्नु ऋषि ने इनके सम्पूर्ण जल को पान कर लिया था, और फिर कान के मार्ग से बाहर किया था, इसलिए इनका नाम जाह्नवी पड़ा। एक दूसरी कथा के अनुसार अगस्त्य ऋषि द्वारा समुद्र के जल को सोख लेने के बाद गंगा ने ही समुद्र को जल का दान किया था—ऋग्वेद तथा सपादलक्ष ब्राह्मण में गंगा का उल्लेख देवधुनि या देव- नदी के नाम से हुआ है। तैत्तिरीय आरण्यक में कहा गया है कि गंगा और यमुना के मध्य रहने वाले लोग विशेष आदर के पात्र हैं। हरिवंश के अनुसार पुरूरवा तथा उर्वशी ने मन्दाकिनी, जिनका आधुनिक नाम गंगा है, के किनारे ५ वर्षों तक वास किया था। मेगास्थनीज़ लिखता है कि "by the two ( the Ganges & the Indus) the Ganga is much the larger . It receives besides, the river sones and the sittokatis the solomatis which are also navigable, and also the Kondochates & the sambos and the magou & the Agoramio & the omalis moreover their fall into it the Karmenasas, a great river, and the Kakanthis and the Anomatio ( Mccrindle Ancient India P P 190—91 ) कुडाल यह सावन्तवाडी के रईस का दुर्ग था। इस दुर्ग के सम्बन्ध में यह छोड़ कर कि इसे सन् १६६१ ई० में शिवाजी ने जीत लिया था और कुछ भी इति- हास में उपलब्ध नहीं है। हिमालय भारतवर्ष का उत्तरी सीमान्त हिमालय अपनी उत्तुंग चोटियों के लिए केवल भारतवर्ष में ही नहीं वरन् सारे संसार में प्रसिद्ध है। इस पर्वत श्रेणी के लिए प्रयुक्त शब्द 'हिमालय' इसके नाम और अर्थ का अक्षरशः द्योतक है। हिमालय का अर्थ 'हिमस्य + आलयः' 'हिम का घर' या हिमानाम् + आलय 'हिम के रहने का घर' होता है। प्राचीन भूगोल वेत्ताओ ने इसका नाम इमौस या दियमौस और हैमोडास दिया है। इन नामों के द्वारा ऐसा पता चलता है कि ये नाम इस पर्वत श्रेणी के पूर्वी और पश्चिमी हिस्से के लोगों द्वारा दिए गए हैं। हैमोडास संस्कृत शब्द हिमरत् (हेमोत) से निकला है, जिसका अर्थ हिमाच्छादित होता है। अलेक्जेण्डर के साथ आने वाले ग्रीक निवासियों ने इसे भारतीय काकेशस के नाम से प्रसिद्ध किया था।
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हिमालय की चौहद्दी के सम्बन्ध में श्री भागवत में ५ वें स्कन्ध के १६वें अध्याय में लिखा है :—'एवं दक्षिणेनेलावृतं निषधो हेमकूटो हिमालयः इति प्रागायता यथा नीलादयः । अयुतयोजनोत्सेधा हरिवर्षकिम्पुरुषभारतानां यथामसंख्यम् ।' अर्थात् इसका विस्तार जहाँ भागवत पुराण के अनुसार सहस्र योजन बताया गया है, वहीं आज के वैज्ञानिक युग में इसकी सीमा को नापने- जोखने का कार्य हो रहा है और इसकी चौहद्दी को निर्धारित करने का प्रयास जारी है। सफलता कहाँ तक मिलेगी कहा नहीं जा सकता। यों कहा जा सकता है कि इसके उत्तरी-पश्चिमी छोर पर काश्मीर और जम्मू राज्य का आधे से अधिक हिस्सा है। इसके पूर्व में उत्तर-प्रदेश, कुमायूँ तथा टेहरी राज्य हैं। इनके अतिरिक्त नेपाल, भूटान तथा सिक्किम के वे राज्य हैं, जो भारतवर्ष की सीमा में सम्मिलित नहीं हैं। हिमालय भारतवर्ष की प्रायः सभी प्रसिद्ध नदियां यथा गंगा, यमुना, शारदा या काली आदि नदियों का उद्गम हिमालय के उत्तरी पर्वत श्रेणी है। 'करनाली' नदी का, जो घाघरा के नाम से भारत में प्रसिद्ध है, उद्गम स्थान उत्तर पर्वत-श्रेणियों से दूर तिब्बत से है। हिमालय की प्रसिद्ध चोटियों में एवरेस्ट चोटियाँ २६००२ फुट, नागा पर्वत २६१८२ फुट, नन्दादेवी २५६६१ फुट, त्रिशूल २३३८२ फुट, पाचौखो २२६७३ फुट तथा नन्दकोट २२५३८ फुट हैं। हिमालय की तराइयों में विभिन्न प्रकार के लोग पाए जाते हैं। काश्मीर में लद्दाख से लेकर भूटान तक हिन्दचीन के लोग ऊपरी हिस्सा में ही पाये जाते हैं, लेकिन सिक्किम, दार्जिलिंग और भूटान में ये लोग इन देशों के निचले भागों में भी वर्तमान हैं। हिमालय का एक यही ऐसा हिस्सा है जहाँ बौद्ध धर्म जीवित रूप में वर्तमान है। मुसलमानों ने इस भाग में इस्लाम धर्म के प्रचार का यथेष्ट प्रयत्न किया लेकिन यहाँ का जलवायु तथा प्राकृतिक असुविधाओं ने सर्वदा उनके प्रयत्न को निष्फल बनाया। १४ वां शताब्दी में मुलतान सिकन्दर ने इस्लाम धर्म का प्रचार तलवार के जोर पर इन हिस्सों में करना आरम्भ किया लेकिन काश्मीर प्रान्त को छोड़कर इस धर्म का प्रचार ओर कहीं नहीं हो सका। जम्मू तथा हिमालय की तराई में उत्तर प्रदेश और पंजाब के हिस्सों में हिन्दू धर्म को ही प्रधानता है। नेपाल में भी राज-परिवार का धर्म हिन्दू ही है। यद्यपि यहाँ हिन्दू धर्म के साथ ही साथ बौद्ध धर्म का प्रचार भी यथेष्ट हुआ है। यहाँ के जिन हिस्सों में हिन्दू धर्म की प्रधानता है वहाँ के

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लोगों की भाषा पहाड़ी है। जो राजस्थानी से मिलती-जुलती है, जिससे यह सिद्ध होता है कि इन स्थानों के रहने वालों के पूर्वज भारतवर्ष से ही आए थे। हिमालय के कुमायूँ प्रदेश के रहने वाले लोग बड़े लजाधुर प्रकृति के हैं और वे सभ्य जगत् के लोगों से मिलने-जुलने में बहुत शर्माते हैं। इस प्रकार के लोग नेपाल के कुछ हिस्सों में भी पाए जाते हैं। लेकिन उनके सम्बन्ध में विशेष नहीं कहा जा सकता। व्यापारिक दृष्टि से हिमालय में उत्पन्न होने वाले अनाजों का कोई विशेष स्थान नहीं है। चावल, गेहूँ, जौ और मडुआ यहाँ की मुख्य उपज है। आलू की खेती भी कुमायूँ प्रदेश में होता है। कुल्लू प्रदेश में सेब, पीच आदि फल भी सफलतापूर्वक उपगाये जाते हैं। हिमालय के इन प्रदेशों में खेती वर्ष में केवल एक बार ही हो सकती है। चाय के बगीचे १६ वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में कुमायूँ प्रदेश में अधिकता से लगाये गए थे लेकिन इस शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ये बगीचे कागड़ा और दार्जिलिंग की सम्पत्ति हो गये हैं। दार्जिलिंग में 'कुनाइन' बनाने के लिये सिनकोना की भी खेती होती है। हिमालय की तराई में शाल, सीसम, देवदार, चीड़ आदि के जंगल बहुत पाए जाते हैं तथा पूर्वी हिमालय में जगली रबर भी पाया जाता है जो कि 'असम' में बिक्री हेतु आता है। हिमालय का पुराना नाम 'हेमवात', 'हिमवान्', 'हिमाचल' 'हिमवत्प्रदेश', 'हिमाद्रि' तथा 'हिमवात' है। कालिका पुराण में इसका उल्लेख पर्वतराज तथा कुमारसम्भव में 'नगाधिराज' के नाम से हुआ है। महाभारत के वनपर्व में लिखा है कि हिमवात प्रदेश नेपाल के ठीक पश्चिम दिशा की ओर बसा हुआ है और यह गंगा, यमुना, सतलज आदि नदियों का उद्गम स्थान है। 'मा र्कण्डेय पुराण, 'महाभारत' तथा 'कुमारसम्भव' के अनुसार यह पहाड़ एक समुद्र से दूसरे समुद्र तक 'कार्मुकस्य यथा गुणा.' के समान फैला हुआ है। 'कुणालजातक' के अनुसार हिमालय प्रदेश का प्रसार ऊँचाई में ५०० लोग तथा चौड़ाई में ३००० लीग माना गया है। कैलास, जिनका उल्लेख संस्कृत साहित्य में अनेक स्थलों पर है, हिमालय पर्वत श्रेणी के मध्य भाग के उत्तर में स्थित है। बौद्ध ग्रन्थों में हिमालय के सात बड़ी-बड़ी झीलों का उल्लेख मिलता है। उनके नाम हैं-अरावणमुण्ड, रवशर, छदन्त, कुणाल, मन्दाकिनी, अनोतत्त तथा सीहप्पपात। महाभारत के सभापर्व और वनपर्व के अनुसार 'मैनाक' पर्वत भी हिमालय का एक हिस्सा था जो कैलास के समीप स्थित था।

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साम्भर सम्भैर नगर जोधपुर और जयपुर राज्यों की सीमा के अन्दर राजपूताने में २६°५५ उत्तर तथा ७५°११ पूर्व साभर झील के किनारे बसा हुआ है। आधु- निक नगर की प्रायः सभी उपयोगी वस्तुयों, जैसे तार घर, विद्यालय, अस्पताल आदि से यह नगर सुसज्ज है। यह नगर चौहान राजपूतों की ८ वीं शताब्दी से ही प्रधान राजधानी माना जाता है। अन्तिम हिन्दू राजा पृथ्वीराज चौहान साभर राय अर्थात् साभर के महाप्रभु कहलाते थे। इतिहास से ज्ञात होता है कि यह नगर मुसलमान बादशाहों के अधिकार में १३ वीं शताब्दी से सन् १७०८ ई० तक रहा, जब कि यह जोधपुर और जयपुर के शासन-कर्त्ताओं द्वारा पुनः उनसे ले लिया गया। साभर झील यहाँ की प्रमुख झील है। यह झील जयपुर और जोधपुर राज्यों के छोर पर २६°५३ तथा २७°२ उत्तर एव ७४°५४ और ७५°१४ पूर्व अजमेर से ५१ मील उत्तर पूर्व तथा दिल्ली से २३० मील दक्षिण पश्चिम बना हुआ है। यह झील समुद्र की सतह से करीब १२०० फुट की ऊँचाई पर है। जब यह भरी रहती है तो इसका क्षेत्रफल करीब ६० वर्गमील हो जाता है। गर्मी के दिनों में यदि कोई इसके एक छोर पर खड़ा होकर दूसरे छोर पर दृष्टि डाले तो यह उसे एक अति विशाल हिम का टुकड़ा नज़र आयगा। लेकिन सचमुच में यह हिम का टुकड़ा नहीं वरन् नमक का शान्त और स्थिर समुद्र है, जो देखने में हिम के टुकड़े के समान दिखाई पड़ता है। किंवदंती प्रसिद्ध है कि शाकभरी देवी ने अपनी पूजा से प्रसन्न होकर एक घने जंगल को विशाल चाँदी के टुकड़े में परिवर्तित कर दिया था और बाद में वहाँ के निवा सियों द्वारा प्रार्थना करने पर उसी स्थान को नमक की झील के रूप में बदल दिया। इसलिए इस झील का नाम 'साम्बर', साकभर का परिवर्तित रूप, पड़ा। यह कथा ६ ठी शताब्दी की है। इतिहास बताता है कि अकबर के राज्य काल से लेकर अहमदशाह के समय तक मुसलमान बादशाहों के हाथ में रहा। अब यह जयपुर और जोधपुर के महाराजाओं के हाथ में है। इसका पश्चिमी हिस्सा पूरा महाराज जोधपुर तथा पूर्वी हिस्सा साभर नगर के साथ जोधपुर और जयपुर दोनों महाराजाओं के हाथ में है। कुछ समय के लिए यह झील मराठों और अमीर खाँ के हाथ में चली गयी थी, जब कि १८३५ से १८४३ तक अगरेजों ने इसे शेखावटी में शान्ति स्थापनार्थ खर्चे के निमित्त अपने अधिकार में रखा था। अन्त में १८७० से यह झील पूर्ण रूप से अगरेजों को लीज पर दे दी गई। और जयपुर तथा

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  • १६१ - जोधपुर के महाराज-गण केवल रायल्टी तथा कुछ वार्षिक रुपये पाने के अधि- कारी रह गए । केदारनाथ केदारनाथ ज्योतिर्लिंग हिमालय पर्वत पर स्थित है । यह अति शीतल स्थान है । हिम का साम्राज्य वर्ष के प्रत्येक माह में रहता है । इसकी ऊँचाई २२८३५ फुट है । यहाँ श्री केदारनाथ जी का अति प्राचीन मन्दिर है । ऐसा कहा जाता है कि यह मन्दिर पाण्डवों के समय का बना हुआ है । यहाँ की भूमि जलमयी है । यह मन्दाकिनी गंगा का उद्गम स्थान है । पवित्र स्थान के एक ओर मन्दाकिनी और दूसरी ओर सरस्वती नदी है जो हिमालय से निकलती है । इस प्राचीन मन्दिर की मरम्मत कुछ काल पूर्व महाराज नेपाल ओर ग्वालियर ने करवाई थी जिसके कारण अभी तक मन्दिर सुरक्षित है । मन्दिर के द्वार पर द्वारपाल खड़े हैं और दीवार पर चारों तरफ पाँचों पाण्डव, द्रोपदी, कुन्ती, पार्वती, लक्ष्मी आदि की मूर्तियों बनी हुई हैं । मन्दिर में जाते ही पहले दालान में इसके दाहिनी ओर लक्ष्मण और जानकी जी सहित भगवान् रामचन्द्र जी के दर्शन होते हैं । बीच में नन्दी ओर गरुड जी हैं । मन्दिर के भीतरी भाग में एक ओर पार्वती जी दूसरी ओर लक्ष्मी जी मूर्तियां हैं । मन्दिर के अन्दर भगवान् शंकर के पीठ भाग का दर्शन होता है । मूर्त्ति लिंग सदृश नहीं है । किन्तु एक टीले के समान है । लोगों का विश्वास है कि भगवान थक कर यहाँ विश्राम के हेतु लेट गये थे । मूर्त्ति इतनी बड़ी है कि दर्शनार्थियों को खड़े होकर घृत का स्नान कराना पड़ता है । मन्दिर का भीतरी भाग अँधेरा है और रातदिन घी का दीपक जला करता है । महाभारत के अध्याय ८३ के ७२ वें श्लोक में केदारनाथ का उल्लेख मिलता है । वाराणसी वाराणसी भारतवर्ष में हिन्दुओं के तीर्थ स्थानों में से एक पवित्र तीर्थ स्थान माना जाता है । पाणिनी की अष्टाध्यायी, पतंजलि के महाभाष्य, भागवत पुराण, स्कन्द पुराण तथा योगिनीतन्त्र में इस पवित्र स्थान का उल्लेख मिलता है । कूर्म पुराण के अनुसार यह नगर प्रयाग से ८० मील नीचे गंगा के उत्तरी किनारे पर वरणा और असी नदियों के बीच बसा हुआ है । चूंकि यह नगर वरणा और असी नदियों के बीच है इसलिये इस नगर का नाम वाराणसी है ।
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  • १६२ - जैनों के "विविधतीर्थ कल्प" के अनुसार वाराणसी चार भागों में विभाजित है । १—देव वाराणसी, जहाँ श्री विश्वनाथ का मन्दिर स्थापित है । २— राजधानी वाराणसी—जहाँ यवनों का वास है । ३—मदन वाराणसी और ४—विजय वाराणसी । जैनियों के मतानुसार पार्श्वनाथ का जन्म काशी में ही हुआ था । चीनदेश के यात्रियों द्वारा वाराणसी पो-लो निस्सी समझा जाता है । उन लोगों के अनुसार इसका क्षेत्रफल ४००० ली माना गया है और इस नगर की बस्ती घनी मानी गई है । उनके मतानुसार इसके मन्दिरों में ३० संघाराम और १०० देवालय हैं । वेदों और पुराणों में अनेक स्थानों पर वाराणसी या काशी का उल्लेख मिलता है । महाभारत के "अनुशासन पर्व" के अनुसार इस नगर के स्थापित करने वाले देवदास किसी युद्ध में हराए जाने के बाद जंगल में भाग गये थे तथा "उद्योग पर्व" के अनुसार भीमसेन के पुत्र इन्हीं देवदास को प्रवर्त्तन नामक एक पुत्र भी था । देवदास की जीवनी के सम्बन्ध में "हरिवंश" में भी बहुत कुछ हमें मिलता है । यद्यपि हिन्दू और जैन धर्म ग्रन्थों में अनेक स्थलों पर काशी का उल्लेख है या अनेक कथाएँ भी मिलती हैं फिर भी इस नगरी की राजनैतिक अवस्था का स्पष्ट वर्णन हमें बौद्ध ग्रन्थों से प्राप्त होता है । बौद्ध काल में काशी ने अपना राजनीतिक महत्व खो दिया था क्योंकि कोशल के राजा प्रसेनजित के समय में काशी कोशल में मिला ली गयी थी । प्रसेनजित के पिता महाकोशल ने अपनी पुत्री कोशलदेवी के राजा बिम्बसार के साथ पाणिग्रहण के अवसर पर काशी नगरी को दहेज स्वरूप दिया था । इसके पश्चात् उत्तरी भारत के शक्तिशाली राजा अजातशत्रु द्वारा यह नगर पूर्ण रूप से जीत लिया गया था और मगध राज्य में मिला लिया गया था । 'गउड' १६ वीं शताब्दी के अन्त तक 'गौड' बंग प्रदेश की राजधानी हिन्दू और मुसलमान राजाओं के शासन-काल में रह चुका है । जैनियों के आचारागसूत्र के अनुसार गौड देश रेशमी कपडों (दुकूल) के लिए प्रसिद्ध था । कुछ लोगों के मतानुसार "गौड़" नाम "गुड़" से निकला है, क्योंकि किसी जमाने में यह देश "गुड़" के व्यापार का केन्द्र समझा जाता था । आज भी मालदा शहर से १० मील की दूरी पर गौड के भग्नावशेष अपने पुरातनपने का
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१३ - १६३ - परिचय दे रहे हैं। यह एक पुराना शहर है, जो गंगा और महानन्दा के संगम पर बसा हुआ है। पद्मपुराण में गौड़ देश का उल्लेख मिलता है और इस देश के राजा का नाम "नरसिंह" था, ऐसा पाया जाता है। पाल वंश के राजाओं ने गौड़ प्रदेश की राजधानी कालिन्दी नदी के किनारे "रामावती" नगरी को बनायी थी। लेकिन इस राजधानी का अब कुछ भी पता नहीं चलता। गौड के राजा लक्ष्मण सेन द्वारा बनायी गयी लक्ष्मणावती बहुत काल तक सेन वंश, और मुसलमान राजाओं की राजधानी रही। सेन वंश के राजा वल्लालसेन के द्वारा गौड में "वल्लालवाडी" नामक एक दुर्ग बनवाया गया था, जिसका भग्नावशेष अब शाहदुल्लापुर के समीप प्राप्त है। आज भी गौड के समीप श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा पवित्र किए हुए स्थान 'रामकेलि' तथा 'रूप' और 'सनातन' के रहने के स्थान रूप सागर, तालाब, कदम्ब का वृक्ष, कुछ कूप एवं मदनमोहन जी का पुरातन मन्दिर पाये जाते हैं। मुसलमान काल के कुछ उल्लेख योग्य स्थान जैसे जामज नमियों की मस्जिद, हवेली खास का भग्ना- वशेष, सोना मसजिद, फीरोज मीनार आदि यहाँ वर्तमान हैं। इनके अतिरिक्त गौडेश्वरी देवी, जहरवासिनी देवी तथा शिव के पुराने मन्दिर भी अभी यहाँ वर्तमान हैं। हर्ष के काल से लेकर लक्ष्मणसेन के काल तक एक नहीं अनेक ऐसे शिलालेख तथा ताम्रपत्र प्राप्त हो चुके हैं, जो गौड देश के प्राचीन इतिहास पर पूर्ण रूप से प्रकाश डालते हैं। इन शिलालेखों और ताम्रपत्रों में से मालवा के राजाओं के नागपुर के शिलालेख 'ई० सन् ११०४-११०५' का उल्लेख इसलिए आवश्यक है कि बीसलदेव रासो में गौड देश के उल्लेख का सूत्र इसके द्वारा स्थापित हो जाता है। इस शिला लेख के द्वारा पता चलता है कि परमार राजा लक्ष्मदेव ने गौड के राजा को हराया था। 'उडीसा' उड़ीसा प्रदेश गंगा नदी के मुहाने से लेकर कृष्णा नदी के मुहाने तक फैला हुआ है। कलिंग के नाम से इस प्रदेश का उल्लेख संस्कृत ग्रन्थों में अनेक स्थलों पर किया गया है। यह भारत के पाँच प्राचीन राज्यों में से एक है। इसकी पुरानी राजधानी अभी भी नगर से आध मील की दूरी पर कलिंगपट्टनम् में वर्तमान है। राज्य दो भागों विभाजित है। गोदावरी के मुहाने (Delta) तक के स्थानो को कलिंग कहा जाता है तथा उत्तर की ओर महानदी के मुहाने तक के स्थान एक अलग प्रदेश बनाते हैं, जिन्हें ओड्र या उत्कल कहा जाता

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है। पण्डितों ने इस नाम की उत्पत्ति और इसके अर्थ पर विभिन्न विचार प्रकट किये हैं। ओड्र बहुत पुराना नाम है और आज का नाम ओड़ीसा या उड़ीसा इसी से बना ज्ञात होता है। जैसे ओद्र + देश = ओड़ीसा। इस शब्द का सम्बन्ध इसी नाम के लाल गुलाब के फूल से लगाया जाता है, जिसे यहाँ के रहनेवाले स्वर्ग के पाँच फूलों में से एक समझते हैं। लेकिन पण्डितों ने इस शब्द की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कहा है कि इस शब्द का अर्थ गढ़ा या धूल है। और इस शब्द के अपने कथित अर्थ को यह कह कर ठीक बनाते हैं कि चूंकि इस प्रदेश के लोग संस्कृत विद्वानों की दृष्टि में बहुत ऊँचे नहीं समझे जाते थे इसलिये यह अर्थ ठीक है। इसका दूसरा नाम उत्कल अवश्य संस्कृत नाम है, जिसका अर्थ उन्नतिशील प्रदेश होता है। (The glorius country) कुछ लोग इस शब्द का अर्थ Land of Bird killer लगाते हैं। तथा कुछ ऐसे भी विद्वान् हैं, जो इसका अर्थ (The outlying Stup) बताते हैं। इस प्रदेश का प्राचीन इतिहास यह बताता है कि यहाँ के आदि निवासी भुइयाँ, सवर, गोंड और खोंट थे जो अपनी अपनी जातियों के प्रधान के साथ पृथक-पृथक समूह बना कर रहते थे। कुछ काल के बाद आर्य गणों का यहाँ प्रवेश हुआ और ये लोग अपनी बुद्धि और क्षमता के द्वारा उन आदि वासियों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने में समर्थ हुए। इतिहास यह भी बताता है कि किस प्रकार "आर्य गण जिनमें मुख्यतया राजपूत थे, उत्तर से तीर्थ यात्रा के हेतु "पुरी" में आकर बस गये और अपना राज्य स्थापित किया। आर्यों के राज्य स्थापित कर लेने के बाद भी उड़ीसा में छोटे-छोटे राज्यों की बहुलता रही तथा इसके मध्यकालीन इतिहास को जानने के लिए इसके निमित्त छोटे छोटे राज्यो के सम्बन्ध में जानना आवश्यक है। पटना राज्य के आधु- निक राज्य-परिवार वाले आज से प्राय ६०० वर्ष पूर्व यहाँ आये थे और उन्होंने अठारह गढ़ जात को जीतकर इस राज्य की स्थापना की। ऐसा कहा जाता है कि इस राज्य परिवार के लोग चौहान जाति के राजपूत थे, जो मैनपुरी के समीप रहते थे और वहाँ से मुसलमानों द्वारा भगा दिये गये थे। पटना में इस जाति के लोगोंने बस कर अपने बल और पौरुष के द्वारा शीघ्र ही आजकल के सम्बलपुर कहे जाने वाले जिले तथा इसके आसपास के राज्यों सोनपुर और बामरा पर अपना आधिपत्य जमा लिया। इसके बाद ही यह जीता हुआ भूखण्ड इस परिवार के दो भाइयों में विभाजित हो गया। इस विभाजन में जिस भाई के हिस्से में सम्बलपुर का राज्य मिला, वही महान् हुआ और पटना को हिस्से में पाने वाला भाई उसके अधीन हुआ। मराठों ने पहले पहल

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सम्बलपुर राज्य को जीता और सम्बलपुर राज्य के जीतने के साथ उनका अधिकार पटना राज्य पर भी हो गया । मयूरभज का १३०० वर्षों का पुराना इतिहास बताता है कि यहाँ जयसिंह नामक एक राजा हुए थे । उनके बाद उनका ज्येष्ठ पुत्र यहाँ का राजा हुआ था, उनका मझला पुत्र क्यौन्झार का राजा हुआ । बौड और दसपल्ला राज्य के प्रमुख भी इसी राजा जयसिंह के वंशज अपने को बताते हैं । अथ मल्लिक, नरसिंगपुर,पाललहरा, तालचर और टिगिरिया राज्य के राजा गण भी अपने को राजपूत कुल का मानते हैं । नयागढ को बसाने वाले रीवा के राजपूत थे और उन्हीं के कुल के पूर्वज खण्डपरा राज्य के अधिष्ठाता थे । उडीसा का रनपुर राज्य सबसे प्राचीन माना जाता है और यहाँ के राजाओं का इतिहास प्रायः ३६०० वर्ष पुराना माना गया है । इस राज परिवार का ही एक ऐसा इतिहास है जिसमें यहाँ के आदि आगन्तुकों का चिन्ह वर्तमान है । यहाँ के राजाओं की सार्वभौमता सर्वदा अक्षुण्ण रही । मुगल और मराठा काल में भी यहाँ के आन्तरिक मामलों में उनके द्वारा कभी हस्त- क्षेप नहीं किया गया । सन् १८०३ में मराठों से ही अंगरेजो ने उडीसा को अपने अधिकार में लिया था ।

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परिशिष्ट ( ख ) गूजर 'गूजर' मारवाड़ की सैनिक जातियों में से एक है। किसी समय गूजर अत्यंत शक्तिशाली थे और गुजरात प्रान्त के अधिपति थे, लेकिन आज न तो ये गुजरात के अधिपति हैं और न इनका कार्य ही सैनिक जातियों का-सा है। आज इनका मुख्य व्यवसाय राजपूताने में पशु पालने का है और ये पशुओं का क्रय विक्रय भी करते हैं। 'गूजर' शब्द संस्कृत भाषा के 'गुर्जर' शब्द का अपभ्रंश है। जनरल कनिंघम के मतानुसार 'गुजरावाला', 'गुजरात', 'गुजरखां' आदि नगरों के नामों के साथ गूजर शब्द का प्रयोग इस जाति के नाम के कारण ही है। ये नगर पंजाब प्रान्त के आसपास हैं, जहाँ यह जाति पहले पहल पहुँचा था। पंजाब से यह जाति दिल्ली आई, दिल्ली से अजमेर तथा सौराष्ट्र पहुँची, और यहाँ से इसने वल्लभीपुर के सम्पूर्ण भू क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित किया। जब इनका अधिकार इस क्षेत्र पर स्थापित हो गया, तब इस क्षेत्र का नाम वल्लभीपुर से परिवर्तित होकर 'गुजरात' पड़ा। जेनरल कनिंघम के उपर्युक्त मत से ऐसा ज्ञात होता है कि यह जाति विदेशी थी और पंजाब प्रान्त से होती हुई भारत में आई। लेकिन श्री के० एम० मुन्शी आदि विद्वानों ने इस जाति की उत्पत्ति भारतीय राजपूतों से मानी है, जिसके प्रमाण में इन विद्वानों ने ताम्रपत्रों तथा ६ ठी शताब्दी की रचनाओं का उल्लेख किया है।१ राजपूताने के भाट भी 'गूजरों' की उत्पत्ति राजपूतों से ही मानते हैं। आज भी गूजरों में पँवार, चौहान तथा चन्देल आदि राजपूतों के, अनेक गोत्र तथा गूजरगौड़, बड़ गूजर तथा गूजर पठान आदि गूजरों के गोत्र राजपूतों, ब्राह्मणों और मुसलमानों में पाये जाते हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से इस जाति के सम्बन्ध में जो सामग्री हमें प्राप्त है और जिसके आधार पर इनकी उत्पत्ति के विषय में विचार किया गया है, वह विशेष प्रामाणिक ज्ञात होता है। सम्भव है इस जाति १-द ग्लोरी दैट वाज गुर्जर देश-के० एम० मुन्शी पृ०-८ ।

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  • १६७ - के राजपूताने में बसने के बाद इनका मिश्रण राजपूताने के अन्य जातियों के साथ हुआ हो और तब से इनके गोत्रों का अन्य अन्य जातियों में पाया जाना सम्भव हुआ हो। भाटों का कथन इसी आधार पर स्थित ज्ञात होता है। आज भी मारवाड़ के पूर्वी परगनों तथा 'पर्वतसर' आदि स्थानों में यह जाति पर्याप्त संख्या में विद्यमान है। यह जाति अपना घर बस्ती से दूर बनाती है क्योकि ऐसा करने में इन्हें अपने व्यवसाय पशु-पालन में सुविधा होती है। कहावत प्रसिद्ध है, 'गूजर जहाँ ऊजड़'। ये छप्पर छाने के कार्य में पटु होते हैं और विशेषकर इस जाति की स्त्रियाँ इस कार्य को करती हैं। उन्हे अपने इस कार्य की दक्षता का अभिमान भी है। ये लोग 'गूजरे डेरीमाता', देवजी¹ तथा 'भैरोजी' की उपासना करते हैं तथा अपने देवताओं के सम्मान में गले में फूल पहनते हैं। ये मास और मदिरा के सेवन के अभ्यस्त हैं। इनके यहाँ मृतक के शव की हजामत बना कर उसकी दाह क्रिया की जाती है और मृतक का श्राद्ध दीपावली पर करने की इनकी परम्परा है। 'कछवाहा' कछवाहा जाति के राजपूत अपने वंश की उत्पत्ति महाराज रामचन्द्र जी के द्वितीय पुत्र 'कुश' से मानते हैं। ऐसा कहा जाता है कि यह जाति अयोध्या से स्थानान्तरित होकर 'नरवर' आयी और वहाँ से रोहतास और 'रोहतास' से 'आमेर' आयी। यहाँ आकर यह जाति बस गयी। अभी भी आमेर में इनकी तीन मुख्य शाखाएँ मिलती हैं :-१. शेखावत, २. नरूका तथा ३. राजावत। १—शेखावत शेखा जी के वंशज हैं। कहा जाता है कि शेख बुरहान नामक किसी मुसलमान फकीर की कृपा से शेखा को जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम मोकल जी था। अतः, इनसे चलने वाली शाखा का नाम शेखा- वत पड़ा। शेखावत अपनी सन्तानों को छह वर्ष की अवस्था तक नीले रंग की टोपी और पायजामा पहनाते हैं। ये लोग सूअर के मांस का भक्षण नहीं करते। २—नरूका अलवर राज्य का शासक वंश है। १. नोट—लगभग ६५० वर्ष पूर्व मेवाड़ में 'देवजी' नाम के एक महात्मा हुए थे। उन्होंने मेवाड़ में अनेक करामातें दिखाई थीं। गूजर इन्हीं 'देवजी' के भक्त हैं।
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  • १६८ - ३—राजावत जयपुर राजवंश के निकटतम कुटुम्बी हैं। पछूदाहा जाति में स्त्रियों की संख्या पुरुषों से अधिक है। ये लोग प्रधानत वैष्णव धर्मको मानने वाले हैं। शैव तथा शाक्त धर्म के अनुयायी इस जाति में बहुत कम पाये जाते हैं। इनकी कुलदेवी का नाम जमुराय माता है। इनके घर की स्त्रियाँ हाथ और कान में स्वर्ण के अतिरिक्त अन्य किसी धातु के गहने का व्यवहार नहीं करतीं। पंवार आबू पर्वत के यज्ञकुण्ड से उत्पन्न चार अग्निकुलों में से पंवार भी एक है। पूर्वकाल में यह वंश अत्यन्त शक्तिशाली था। परम प्रतापी राजा भोज तथा राजा विक्रमादित्य इसी वंश के भूषण थे। मारवाड़ में इस वंश की जो कथा प्रचलित है, उसके अनुसार वहाँ के बाड़मेर स्थान के किसी "धरणीवराह" नाम के राजा का नाम लिया जाता है, जो इस वंश के आदि पूर्वज थे। इनके नौ भाई थे। धरणीवराह ने मारवाड़ को नौ भागों में बांट कर एक एक भाग प्रत्येक भाई को सौंप दिया और 'कोट किराड़ू' अपने पास रखा। यही विभाजन आज भी मारवाड़ में नौकोट मारवाड़ के नाम से प्रसिद्ध है। एक पद भी इस सम्बन्ध में लोग गाते पाये जाते हैं— मंडोवर सावत हुओ अजमेर सिधसू । गढ़ पूगल गजमल्ल हुओ, लूदवे भान भू ॥ आलपाल अर्बुद भोजराजा जालन्धर । जोग राज पर घाट हुओ हसू पारक्कर ॥ नवकोट किरोट संजुगत थिर पवारा थापिया । धरणीवराह घर भाइयों को बाँट भुजगुण किया ॥ अर्थात् धरणीवराह ने पंवारों की सारी जमीन नौ भागों में विभाजित कर अपने नौ भाइयों को दे दिया और कोट किराडू अपने पास रखा। इस विभा- जन के अनुसार मंडोर सावन्त को अजमेर सिधु को, पूगलगढ़ गजमल्ल को, लुद्रवा भान को, आबू आलपाल को, जालंधर अर्थात् जालोर भोजराज को, तथा जोगराज को 'घात' और उमरकोट, एवं पारकर हंसराज को प्राप्त हुआ। इस विभाजन से पंवारों की शक्ति क्षीण हो गयी और चौहान, राठौर, पड़िहार आदि राजपूताने की अन्य छेत्री जातियों ने इन नौ राजाओं को धीरे धीरे जीत लिया। आज भी पंवारों की कुछ शाखाएँ 'सोढा', 'साखला', 'भयाल' आदि मारवाड़ में पाई जाती हैं। इन शाखाओं की जीविका निर्वाह का साधन अब
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किसानी है । कहीं-कहीं पंवारों में लोग शव को उलटा रख कर शवदाह करते हैं । इनके पूर्व वैभव का एक सोरठा प्रसिद्ध है:— पृथ्वो बडा पयार, पृथ्वी पंवारातणी । एक उजेणी धार, दूजो आवू नैठणूं ॥ चौहान पंवार की तरह चोहान भी उन चार अग्निकुल वंशीय राजपूतों में से एक है, जिनकी उत्पत्ति आवू पर्वत पर किये गये यज्ञ के अग्निकुण्ड से मानी जाती है । कर्नल टाड के मतानुसार राजपूत जाति की समस्त शाखाओं में से ये वीरता में सर्वश्रेष्ठ हैं । पंवर वंश के पश्चात् कुछ काल तक दिल्ली पर इन्हीं का शासन रहा । मारवाड में भी अनेक स्थानों पर इनका अधिकार था और ये उन स्थानों के शासक रह चुके हैं । बीसलदेव रासो के अध्ययन से पता चलता है कि ११ वीं शताब्दी में अजमेर के शासक चोहान वंशीय राजा ही थे । आज भी मारवाड के विभिन्न भागो में ये अपनी वीरता की सेवाओं के उपलक्ष्य में प्राप्त भूभाग को लिये हुए बसे हुए हैं । चौहान वंश से जिन शाखाओं का विकास हुआ है, उनमें मुख्य और महत्व- पूर्ण 'देवडा', 'हाडा', 'सोनगरा', 'निवाणपुर्विया' और 'सांचोरा' हैं । इन विभिन्न शाखाओं के अतिरिक्त एक शाखा मुसलमान चौहाना की भी है, जो सन् १३८३ ई० में फिरोजशाह तुगलक के शासन काल में मुसलमान हो गये थे । इस शाखा के चोहान 'कायमखानी' नाम से प्रसिद्ध हैं । चौहान वंश की कुलदेवी शाकंभरी माता हैं । इस वंश के राजपूतों में 'गोगा जी' का नाम बहुत प्रसिद्ध है । ये लोग उनके नाम का एक धागा धारण करते हैं और विश्वास करते हैं कि यह धागा साँप के काटे व्यक्ति को स्वस्थ करने में समर्थ है । भाद्र सुदी ६ को ये लोग 'गागानवमी' नामक उत्सव मनाते हैं । ये गोगाजी कान थे कहा नहीं जा सकता । लेकिन इनकी मान्यता और प्रसिद्धि को देखते हुए ज्ञात होता है कि ये अवश्य कोई सिद्ध पुरुष, इनके वंश में हुए होंगे । 'कायमखानी' भी गोगा जी को गोगापीर के नाम से पूजते हैं । पश्चिमी प्रान्तो के निवासी चौहानों में उत्तराधिकार में प्राप्त सम्पत्ति को पुत्रों एव विधवा स्त्रियो में बाँटने की प्रथा है । इसी वंश ने सर्व प्रथम 'नाता प्रथा' का प्रचलन किया और 'नातरायत' के नाम से नवीन समुदाय की नींव डाली । जालोर के राजा कानडदेव ही वे प्रथम राजा थे, जिन्होने अपनी विधवा पुत्री का पुनर्विवाह चित्तौड के राणा के साथ कर 'नाता प्रथा' को आरम्भ किया था ।

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  • २०० - भाटी भाटी वंश के राजपूत अपनी उत्पत्ति भगवान् कृष्ण तथा चन्द्रवंशी राज- पूतों के पूर्व पुरुष यदु से मानते हैं। इस वंश के राजपूतों का स्थान राठौड वंश के पश्चात् आता है। कर्नल टाड ने भाटी राजपूतों को भारतवर्ष के समस्त राजपूतों की अपेक्षा अधिक प्रसिद्ध माना है। जैसा कि ऊपर कहा गया है, इस जाति की उत्पत्ति के विषय में यह कथा प्रचलित है कि महाभारत के युद्ध के बाद भगवान् श्रीकृष्ण के उत्तराधिकारी मध्य एशिया में चले गये थे, और वहाँ से उन्होंने गजनी आदि प्रदेशों की स्थापना की। जब उन्हें ये सब स्थान किसी कारणवश छोड़ने पड़े, तब वे लौट कर पञ्जाब आये और दीर्घ काल तक पञ्जाब प्रान्त के 'भटनेर' नगर में बसे रहे। यही कारण है कि इनका नाम भाटी प्रसिद्ध हुआ। लेकिन कर्नल वाल्टर और कर्नल इण्ट का मत है कि किसी काल में इस वंश में भाटी नाम का कोई वीर योद्धा हुआ था और उसी के नाम पर इस वंश के राजपूतों का नाम भाटी पड़ा। इनकी उत्पत्ति चाहे उपर्युक्त कारणों में से किसी भी एक कारण से हुई हो लेकिन ये लोग भटनेर में बसे अवश्य थे, जहाँ से ये दिरावल होते हुए जैसलमेर गये और वहां अवस्थित हो गये। इस समय जैसलमेर ही इस वंश का केन्द्र स्थान है। इस सम्बन्ध में निम्न दोहा सुना जाता है — मथुरा काशी प्रागवड गजनी अरु भटनेर । दिगम दिरावल लोद्रवो नग्गो जैसलमेर ॥ कर्नल टाड का कथन है कि भाटी राठौडों के समान न तो अन्य छत्री दीर्घकाय और पुष्ट शरीर वाले ही होते हैं और न कछवाहों की भाँति सुन्दर आकृति वाले ही, लेकिन इनकी रूपरेखा आकर्षक और सुडौल होती है तथा वर्ण स्वच्छ होता है। भाटियों की दो शाखाएँ—१. 'जैसा' और २ 'रावलोत' मारवाड में आबाद हैं। इस वंश का वैवाहिक सम्बन्ध राजाओं और जागीरदारों के साथ अधिक होने के कारण इनके पास अभी भी अनेक जागीरें वर्तमान हैं।
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परिशिष्ट (ग) शब्दार्थ 'अ' अठार—अठारह, प्रहारह । अडहव—अनोखा, अद्वितीय । अकुलीणीय— अकुलीन । अवफर--अपशब्द । अगध—दोष । अछइ—है । अगुहार—अगुशारि, अनुकरण करने वाला, समान । अरथ-अर्थ, धन । अस-ऐसा । अपहछ- अपद छू, अपच्छ, अहितकर । अनइ-अरण-जाना, नाग, पानी । अम्हि-मेरे । अवली सवली-सजी धजी । अहिनाण-अभिज्ञान, चिन्ह । अरण—आदि । 'आ' आपणइ-अपने । आभर-आभरण-गहना । आपडीया-आँख । आहेटीय- अहेरी । आखदियउ-आनन्दित हुआ । आगिला-आगे । आजणी-अजन । आवासइ-रहने का स्थान । आसजीयउ-आरुजिन्न-आसक्त । आगली-बढ कर, अच्छी, सुन्दर । आल-दोषारोपण, आड, अवलम्ब । आखरी-तेज । आणि- आनि-लाकर । आगलउ-आगे । आपि-ठमका—पलक मारते ही । 'इ' इसउ—ऐसे । "उ ऊ" उलगाणा-प्रवासी । ऊलगइ-स्मरणीय । उछाह-उत्साह । उघरउ-उद्धार । उलीभ-उलीय-कुलीय-उभइइ-निकलता है, सान से निकलता है । उलग- परदेश, प्रवास । उलगायउ-प्रवास के निमित्त । उचाय-उभय-त्याग देना,छोड़ देना । उछइ-उच्छइ-आच्छादित । उसीस-उस्सास-उच्छ्वास ( उस्रं प्रबल : श्वास • उच्छ्वास : ) ऊँचा श्वास लेना । उमाईयउ-उमग पर । उलट्यउ- उलट पडा हो । ऊतउ-वहा । उजला-उज्ज्वल । उसाकी-उसकी । उधर-उदर- पेट । उमाहियउ-उम्भाहियउ-विनाथित । उलपउ-देख सकना । उशनइ- उनको । उभादियउ-आवेगा । उबरउ-उसका, उनका । उरिआ-हृदय में । उमाही-उमग । उससाइ-उत्साह । उल्ली-गहरा रही है । उभलयउ-अच्छा ।

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  • २०३ - चींत-चिन्ता । चतइ-चित्त । चंपीया-दबा हुआ। चउरी-चउरिया-शुभ मण्डप । चंडीयउ-प्रबल, उग्र । चउरासिया-विशिष्ट पदाधिकारी । चिन्तवइ-चिन्ता करना, विचार करना । चऊथि-चतुर्थी ( गणेश चतुर्थी ) । चौरजउ-जिस प्रकार चोर रखता है । चउपंडी-चार खण्ड, चार खण्ड का राजमहल । चीड़ीय-चिड़िया । चीरी-चिट्ठी । चउरा-चौपाल । चाउ-चादर । "छ" छाइड-छाना। छुंडी-छोड़ दी । छिवणी-स्पर्श करना, छूना । छार-राख । छोड़ि-डाल दी । छोटीय-छोटी छाड़ई-छांट । "ज" जूवा-जुव-तरुण । जइतूं-जो तू । जनम हूयउ-जन्म हुआ । जान-यान- बारात । जोसि-ज्योतिषी-पण्डित । जोग-युक्ति । जूठउ-झूठा । जोगनी- जोइणी-योगिनी (ये ६४ हैं) । जुइ (जुड़ई)-जुड़ जाते हैं । जिहा-जिस । जोइ ज्योँ-देखना, खोजना । जइरि-यदि । जमडाढ़-तलवार । जुहारण-नमस्कार । जोड़इ-आरम्भ करना । जायता-जीवता । जाइ-जाता है, जाकर । ज-प्रमान । "झ" झलवलइ-चमकना । झूग्ता-चिन्ता, झूरना, सूखना, पछताना, विलाप करना । झुण कार-रुनझुन । झिगमिगइ-जगमगाना । झंपियउ-झांपना, व्यथित हुआ । झीड़ई-पतली । झलकय-झलकती है, चमकती है । झलमलई- चमकता है । झाल-ज्वाला । झुनाकउ-जूनागढ़ का । "ट" टसकला मुसकला-घटकना, मटकना । टउरि-मैं जिस प्रकार । टेकि- पकड़कर । "ठ" ठअकती-ठुमकती चाल, रुक कर चलना । ठयइ-ठह्रइ-ठविय-रखता । ठाकुर-राजा । ठामोठामि-जगह-जगह । ठांइ-स्थान । "ड" डालीयउ-फेंकना ।