संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
by महर्षि वेदव्यास
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एकाम्रकक्षेत्र तथा पुरुषोत्तमक्षेत्रकी महिमा
लोमहर्षणजी कहते हैं—‘महर्षियो! ब्रह्माजीकी कही हुई पवित्र कथा सुनकर उन महर्षियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। उन्होंने कहा—‘ब्रह्मन्! अब आप एकाम्रकक्षेत्रका वर्णन कीजिये।’
**ब्रह्माजी बोले—**मुनिवरो! वह क्षेत्र सब पापोंको हरनेवाला, पवित्र एवं परम दुर्लभ है। मैं उसका संक्षेपसे वर्णन करूँगा, सुनो। एकाम्रक नामसे विख्यात क्षेत्र वाराणसीके समान कोटि शिवलिङ्गोंसे युक्त एवं शुभ है। उसमें आठ तीर्थ हैं। पूर्व कल्पमें वहाँ एक आमका वृक्ष था। उसीके नामसे वह एकाम्रकक्षेत्रके रूपमें विख्यात हुआ। वह स्थान हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरा रहता है, वहाँ स्त्रियाँ भी रहती हैं और पुरुष भी। उस क्षेत्रमें विद्वानोंकी अधिकता है, वह धन-धान्यसे सम्पन्न स्थान है। घर और गोपुर वहाँकी शोभा बढ़ाते हैं। वहाँ अनेकों व्यवसायी भरे हुए हैं। भाँति-भाँतिके रत्न उस क्षेत्रकी शोभा बढ़ाते हैं। नगर, अटारी, सड़क और राजहंसोंके समान श्वेत महल आदिके द्वारा उसकी बड़ी शोभा होती है। उसके चारों ओर सफेद चहारदीवारी बनी है। शस्त्रोंद्वारा उस पुरकी रक्षा होती है। अनेकों खाइयोंसे वह क्षेत्र अलङ्कृत है। वहाँ प्रतिदिन उत्सवका आनन्द छाया रहता है। नाना प्रकारके बाजोंकी ध्वनि सुनायी पड़ती है। चहारदीवारी और बगीचोंसे युक्त अनेक दिव्य देवमन्दिर सब ओर उस क्षेत्रकी शोभा बढ़ाते हैं। वहाँके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र बड़े धार्मिक हैं। वे अपने-अपने धर्मोंमें संलग्न रहते हैं। उस क्षेत्रमें निर्धन, मूर्ख, दूसरोंसे द्वेष रखनेवाले, रोगी, मलिन, नीच, मायावी, रूपहीन, दुराचारी तथा परद्रोही मनुष्य नहीं हैं। वहाँ सर्वत्र सुखपूर्वक सब लोग घूमते-फिरते हैं। वह स्थान सब जीवोंके लिये सुखद है। वहाँ नाना प्रकारके पक्षियोंका कलरव सुनायी पड़ता है। वहाँके उद्यान नन्दनवनके समान एवं सबके सेवन करने योग्य हैं। वहाँके वृक्ष फलोंके भारसे झुके रहते हैं और सभी ऋतुओंमें उनसे फूल झड़ते रहते हैं। दीर्घिका, तड़ाग, पुष्करिणी, वापी तथा अन्यान्य जलाशय सदा कमलवनसे सुशोभित रहते हैं। भाँति-भाँतिके वृक्ष, नाना प्रकारके सुन्दर पुष्प तथा अनेक प्रकारके पवित्र जलाशय सब ओरसे उस स्थानकी शोभा बढ़ाते हैं।
उस क्षेत्रमें साक्षात् भगवान् शङ्कर सब लोकोंका हित करनेके लिये निवास करते हैं। वे भोग और मोक्ष दोनोंके दाता हैं। इस पृथ्वीपर जितने तीर्थ, नदियाँ, सरोवर, पुष्करिणी, तड़ाग, वापी, कूप और सागर हैं, उन सबसे पृथक्-पृथक् जलकी बूँदें संगृहीत करके देवताओंसहित भगवान् शङ्करने उस क्षेत्रमें सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये विन्दुसर नामक तीर्थ स्थापित किया। इसीलिये वह विन्दुसरके नामसे विख्यात है। अगहनके कृष्णपक्षकी अष्टमीको जो वहाँकी यात्रा करता है तथा जो जितेन्द्रिय भावसे विषुवयोगमें श्रद्धाके साथ विधिपूर्वक विन्दुसरोवरमें स्नान करके तिल और जलसे नाम-गोत्रके उच्चारणपूर्वक देवताओं, ऋषियों, मनुष्यों एवं पितरोंका तर्पण करता है, वह अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है। जो ग्रहण, विषुवयोग, संक्रान्ति, अयनारम्भ, छियासी युगादि तिथि तथा अन्यान्य शुभ तिथियोंमें वहाँ ब्राह्मणोंको धन आदिका दान करते हैं, वे अन्य तीर्थोंकी अपेक्षा सौगुना फल पाते हैं। जो विन्दुसरोवरके तटपर पितरोंको पिण्डदान देते हैं, वे उन पितरोंकी अक्षय तृप्तिका सम्पादन करते हैं।
स्नानके पश्चात् मौन एवं जितेन्द्रिय भावसे