संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context- मार्कण्डेय मुनिको प्रलयकालमें बालमुकुन्दका दर्शन और उनका वरदान प्राप्त होना * १२३
श्रीकृष्ण! प्रसन्न होइये। अरिष्टासुरका नाश करनेवाले गोविन्द! प्रसन्न होइये। दैत्यनाशक श्रीकृष्ण! प्रसन्न होइये। दानवोंका अन्त करनेवाले वासुदेव! प्रसन्न होइये। मथुरावासी हरे! प्रसन्न होइये। यदुनन्दन! प्रसन्न होइये। इन्द्रके छोटे भाई उपेन्द्र! प्रसन्न होइये। वरदायक अविनाशी देव! प्रसन्न होइये। भगवन्! आप ही पृथ्वी, आप ही जल, आप ही अग्नि और आप ही वायु हैं। जगत्पते! आकाश, मन, अहंकार, बुद्धि, प्रकृति तथा सत्त्वादि गुण भी आप ही हैं। आप सम्पूर्ण विश्वमें व्यापक पुरुष हैं। पुरुषसे भी उत्तम पुरुषोत्तम हैं। प्रभो! आप ही सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और उनके शब्द आदि विषय हैं। आप ही दिक्पाल, धर्म, वेद, दक्षिणासहित यज्ञ, इन्द्र, शिव, देवता, हविष्य और अग्नि हैं। वसु, रुद्र, आदित्य और ग्रह भी आपके ही स्वरूप हैं और जितनी भी जातियाँ हैं, जो कुछ भी जीव-नामधारी पदार्थ है, वह सब आप ही हैं। अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता, ब्रह्मासे लेकर तिनकेतक जो कुछ भी भूत, भविष्य और वर्तमान चराचर जगत् है, वह आप ही हैं। देव! आपका जो परमस्वरूप है, वह कूटस्थ, अचल एवं ध्रुव है। उसे ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं जान पाते। फिर हम-जैसे छोटी बुद्धिवाले मनुष्य कैसे उसका तत्त्व समझ सकते हैं। भगवन्! आप शुद्धस्वभाव, नित्य, प्रकृतिसे परे, अव्यक्त, शाश्वत, अनन्त एवं सर्वव्यापी महेश्वर हैं। आप ही आकाशस्वरूप, परम शान्त, अजन्मा, व्यापक एवं अविनाशी हैं। इस प्रकार आपके निर्गुण एवं निरञ्जन (मायारहित शुद्ध) रूपकी स्तुति कौन कर सकता है। देव! अविनाशी देवदेवेश्वर! मैंने जो विकल एवं अल्पज्ञान होनेके कारण आपके स्तवनकी धृष्टता की है, उसे आप क्षमा करनेकी कृपा करें।
मार्कण्डेयके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् बहुत प्रसन्न हुए और मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले—'मुनिश्रेष्ठ! तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, उसे कहो। ब्रह्मर्षे! तुम मुझसे जो कुछ चाहोगे, वह सब तुम्हें दूँगा।'
मार्कण्डेयजी बोले—देव! मैं आपको और आपकी मायाको जानना चाहता हूँ। देवेश! आपकी कृपासे मेरी स्मरणशक्ति लुप्त नहीं हुई है। पुण्डरीकाक्ष! आप अव्यय हैं, मैं आपके तत्त्वको समझना चाहता हूँ। इस सम्पूर्ण जगत्को पीकर आप साक्षात् परमेश्वर यहाँ बालरूपसे क्यों रहते हैं? ये सब बातें बतानेकी कृपा करें।
मुनिके इस प्रकार पूछनेपर परम कान्तिमान् देवाधिदेव श्रीहरिने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—"ब्रह्मन्! देवता भी मुझे ठीक-ठीक नहीं जानते; किंतु तुमपर प्रेम होनेके कारण मैं अपना रहस्य बतलाऊँगा कि कैसे इस जगत्की सृष्टि करता हूँ। ब्रह्मर्षे! तुम पितृभक्त हो और मेरी शरणमें आये हो; इसीलिये तुम्हें मेरे स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन हुआ है। तुम्हारा ब्रह्मचर्य महान् है। पूर्वकालमें मैंने जलको 'नारा' नाम दिया था, उस 'नारा' में मेरा सदा अयन (निवास) रहता है; इसलिये मैं 'नारायण' कहलाता हूँ। द्विजोत्तम! मैं नारायण ही सबकी उत्पत्तिका कारण, सनातन, अविनाशी, सम्पूर्ण भूतोंका स्रष्टा और संहर्ता हूँ। मैं ही विष्णु, मैं ही ब्रह्मा और मैं ही देवराज इन्द्र हूँ। यक्षराज कुबेर और प्रेतराज यम भी मैं ही हूँ। मैं ही शिव, चन्द्रमा, प्रजापति कश्यप, धाता, विधाता और यज्ञ हूँ। अग्नि मेरा मुख, पृथ्वी चरण, चन्द्रमा और सूर्य नेत्र, द्युलोक मस्तक, आकाश और दिशाएँ कान तथा जल स्वेद है। दिशाओंसहित