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संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished434 pages

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Page 162

१६० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


तुम्हीं व्रत, तुम्हीं स्वर्ग, तुम्हीं परब्रह्म और तुम्हीं मोक्ष हो।१ आर्य! मेरे लिये चिन्ता न करो। अपनी बुद्धिको धर्ममें स्थिर करो। तुम्हारी कृपासे मैंने बहुतेरे भोग भोग लिये हैं।'

अपनी प्रिया कपोतीका यह वचन सुनकर कपोत उस वृक्षसे उतर आया और पिंजड़ेमें पड़ी हुई कपोतीके पास गया। वहाँ पहुँचकर उसने देखा, मेरी प्रिया जीवित है और व्याध मृतककी भाँति निश्चेष्ट हो रहा है। तब उसने उसे बन्धनसे छुड़ानेका विचार किया। कपोतीने रोकते हुए कहा—'महाभाग! संसारका सम्बन्ध स्थिर रहनेवाला नहीं है, ऐसा जानकर मुझे बन्धनसे मुक्त न करो। इसमें मुझे व्याधका अपराध नहीं जान पड़ता। तुम अपनी धर्ममयी बुद्धिको दृढ़ करो। ब्राह्मणोंके गुरु अग्नि हैं। सब वर्णोंका गुरु ब्राह्मण है। स्त्रियोंका गुरु उसका पति है और सब लोगोंका गुरु अभ्यागत है। जो लोग अपने घरपर आये हुए अतिथिको वचनोंद्वारा संतुष्ट करते हैं, उनके उन वचनोंसे वाणीकी अधीश्वरी सरस्वती देवी तृप्त होती हैं। अतिथिको अन्न देनेसे इन्द्र तृप्त होते हैं। उसके पैर धोनेसे पितर, उसके भोजन करनेसे प्रजापति, उसकी सेवा-पूजासे लक्ष्मीसहित श्रीविष्णु तथा उसके सुखपूर्वक शयन करनेपर सम्पूर्ण देवता तृप्त होते हैं। अतः अतिथि सबके लिये परम पूजनीय है। यदि सूर्यास्तके बाद थका-माँदा अतिथि घरपर आ जाय तो उसे देवता समझे; क्योंकि वह सब यज्ञोंका फलरूप है। थके हुए अतिथिके साथ गृहस्थके घरपर सम्पूर्ण देवता, पितर और अग्नि भी पधारते हैं। यदि अतिथि तृप्त हुआ तो उन्हें भी बड़ी प्रसन्नता होती है और यदि वह निराश होकर चला गया तो वे भी निराश होकर ही लौटते हैं।२ अतः प्राणनाथ! आप सर्वथा दुःख छोड़कर शान्ति धारण कीजिये और अपनी बुद्धिको शुभमें लगाकर धर्मका सम्पादन कीजिये। दूसरोंके द्वारा किये हुए उपकार और अपकार दोनों ही साधु पुरुषोंके विचारसे श्रेष्ठ हैं। उपकार करनेवालोंपर तो सभी उपकार करते हैं। अपकार करनेवालोंके साथ जो अच्छा बर्ताव करे, वही पुण्यका भागी बताया गया है।३

**कपोत बोला—**सुमुखि! तुमने हम दोनोंके


१. तुष्टे भर्तरि नारीणां तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः। विपर्यये तु नारीणामवश्यं नाशमाप्नुयात्॥
त्वं दैवं त्वं प्रभुर्मह्यं त्वं सुहृत्त्वं परायणम्। त्वं व्रतं त्वं परं ब्रह्म स्वर्गो मोक्षस्त्वमेव च॥
(८०।४०-४१)

२. गुरुर्ग्निद्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः॥
पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः। अभ्यागतमनुप्राप्तं वचनैस्तोषयन्ति ये॥
तेषां वागीश्वरी देवी तृप्ता भवति निश्चितम्। तस्यान्नस्य प्रदानेन शक्रस्तृप्तिमवाप्नुयात्॥
पितरः पादशौचेन अन्नाद्येन प्रजापतिः। तस्योपचाराद्वै लक्ष्मीर्विष्णुना प्रीतिमाप्नुयात्॥
शयने सर्वदेवास्तु तस्मात्पूज्यतमोऽतिथिः।
अभ्यागतमनुश्रान्तं सूर्योढं गृहमागतम्। तं विद्याद्देवरूपेण सर्वक्रतुफलो ह्यसौ॥
अभ्यागतं श्रान्तमनुव्रजन्ति देवाश्च सर्वे पितरोऽग्नयश्च। तस्मिन् हि तृप्ते मुदमाप्नुवन्ति गते निराशेऽपि च ते निराशाः॥
(८०।४७—५२)

३. उपकारोऽपकारश्च प्रवराविति सम्मतौ। उपकारिषु सर्वोऽपि करोत्युपकृतिं पुनः॥
अपकारिषु यः साधुः पुण्यभाक् स उदाहृतः॥
(८०।५४-५५)