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संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished434 pages

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Page 258

२५६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


समझना चाहिये। कन्याओंको जो कुछ दिया जाता है, उसका पुण्य अक्षय होता है।'*

कन्याके यों कहनेपर भगवान् सूर्य बोले—'बेटी! मैं क्या करूँ। तुम्हारी आकृति भयंकर है, इसलिये कोई तुम्हें ग्रहण नहीं करता। स्त्री और पुरुषके विवाह-सम्बन्धमें लोग एक-दूसरेके कुल, रूप, वय, धन, विद्या, सदाचार और सुशीलता आदि देखा करते हैं। मेरे यहाँ सब कुछ है, केवल तुममें गुणोंका अभाव है। क्या करूँ, कहाँ तुम्हारा विवाह करूँ? यदि तुम्हारा ऐसा विचार हो कि जिस किसीके साथ विवाह कर दिया जाय तो तुम अपनी स्वीकृति दो। मैं आज ही तुम्हारा विवाह किये देता हूँ।' यह सुनकर विष्टिने अपने पितासे कहा—'पति, पुत्र, धन, सुख, आयु, रूप और परस्पर प्रेम—ये पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके अनुसार प्राप्त होते हैं। जीव पहले जन्ममें जो बुरा-भला कर्म किये रहता है, उसके अनुकूल ही दूसरे जन्ममें उसे फल मिलता है; अतः पिताको तो उचित है कि वह अपने दोषसे मुक्त हो जाय—कन्याका कहीं योग्य वरके साथ विवाह कर दे। फल तो उसे पूर्वजन्मके कर्मोंके अनुसार ही मिलेगा। पिता अपने वंशकी मर्यादाके अनुसार कन्याका दान और विवाह-सम्बन्ध करता है। शेष बातें जो प्रारब्धमें होती हैं, वे मिल जाती हैं।'

कन्याका यह कथन सुनकर भगवान् सूर्यने अपनी लोकभयंकारी भीषण कन्या विष्टिका विवाह विश्वकर्माके पुत्र विश्वरूपसे कर दिया। विश्वरूप भी वैसे ही भयंकर आकारवाले थे। उन दोनोंके शील और रूपमें समानता थी, अतः सदा आपसमें प्रेम बना रहता था। उस दम्पतिसे गण्ड, अतिगण्ड, रक्ताक्ष, क्रोधन, व्यय और दुर्मुख नामक पुत्र उत्पन्न हुए। इन सबसे छोटा एक पुत्र और हुआ, जिसका नाम हर्षण था। वह पुण्यात्मा, सुशील, सुन्दर, शान्त, शुद्धचित्त तथा बाहर-भीतरसे पवित्र था। एक दिन वह अपने मामाको देखनेके लिये यमराजके घर आया। वहाँ उसने बहुत-से ऐसे जीव देखे, जो स्वर्गकी ही भाँति सुखी थे और बहुतेरे दुःखी भी दिखायी दिये। हर्षणने सनातन धर्मस्वरूप अपने मामाको प्रणाम करके पूछा—'तात! ये कौन सुखी हैं और कौन नरकमें कष्ट भोगते हैं?'

उसके इस प्रकार पूछनेपर धर्मराजने सब बातें ठीक-ठीक बता दीं। उन्होंने कर्मोंकी सम्पूर्ण


न तस्य रौरवादिभ्यः कदाचिन्निष्कृतिर्भवेत्। विवाहातिक्रमः कार्यो न कन्यायाः कदाचन॥
तस्मिन् कृते यत्पितुः स्यात्पापं तत्केन कथ्यते॥ (१६५। १०–१३)
* यत्कन्यायाः पिता कुर्याद् दानं पूजनमीक्षणम्॥
यत्कृतं तत्कृतं विद्यात्तासु दत्तं तदक्षयम्। (१६५। १५–१६)