वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context१२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ दृष्टान्तसे प्रलयकालमें सबका ब्रह्ममें ही विलय और सृष्टिकालमें पुनः उसीसे प्राकट्य बताकर ब्रह्मको ही जगत्का कारण सिद्ध किया गया है। यह बात प्रश्न और उसके उत्तरमें कहे हुए वचनोंसे सिद्ध होती है। इसके सिवा, काण्वशाखावालोंने तो अपने ग्रन्थमें इस विषयको और भी स्पष्ट कर दिया है। वहाँ अजातशत्रुने कहा है कि ‘यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद् य एष विज्ञानमयः पुरुषस्तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते तानि यदा गृह्णत्यथ हैतत्पुरुषः स्वपिति नाम।’ (बृह० उ० २।१।१७) अर्थात् ‘यह विज्ञानमय पुरुष (जीवात्मा) जब सुषुप्ति-अवस्थामें स्थित था (सोता था) तब यह बुद्धिके सहित समस्त प्राणोंको अर्थात् मुख्य प्राण और समस्त इन्द्रियोंकी वृत्तिको लेकर उस आकाशमें सो रहा था, जो हृदयके भीतर है। उस समय इसका नाम ‘स्वपिति’ होता है’ इत्यादि। इस वर्णनमें आया हुआ ‘आकाश’ शब्द परमात्माका वाचक है। अतः यह सिद्ध होता है कि यहाँ सुषुप्तिके दृष्टान्तसे यह बात समझायी गयी है कि जिस प्रकार यह जीवात्मा निद्राके समय समस्त प्राणोंके सहित परमात्मामें विलीन-सा हो जाता है, उसी प्रकार प्रलयकालमें यह जड़-चेतनात्मक समस्त जगत् परब्रह्ममें विलीन हो जाता है; तथा सृष्टिकालमें जाग्रत्की भाँति पुनः प्रकट हो जाता है। सम्बन्ध—आचार्य जैमिनि अपने मतकी पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— वाक्यान्वयात् ॥ १।४।१९॥ वाक्यान्वयात् = पूर्वापर वाक्योंके समन्वयसे (भी उस प्रकरणमें आये हुए जीव और मुख्य प्राणके लक्षणोंका प्रयोग दूसरे ही प्रयोजनसे हुआ है, यह सिद्ध होता है)। व्याख्या—प्रकरणके आरम्भ (कौ० उ० ४।१८)-में ब्रह्मको जानने- योग्य बताकर अन्तमें उसीको जाननेवालेकी महिमाका वर्णन किया गया है (कौ० उ० ४।२०)। इस प्रकार पूर्वापरके वाक्योंका समन्वय करनेसे