वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context१३० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु। कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति॥ यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय। तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥ (३।२।७-८) 'ब्रह्मज्ञानी महापुरुषका जब देहपात होता है, तब पंद्रह कलाएँ और सम्पूर्ण देवता अपने-अपने कारणभूत देवताओंमें जाकर स्थित हो जाते हैं, फिर समस्त कर्म और विज्ञानमय जीवात्मा ये सब-के-सब परम अविनाशी ब्रह्ममें एक हो जाते हैं; जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपने नाम-रूपको छोड़कर समुद्रमें विलीन हो जाती हैं; वैसे ही विद्वान् ज्ञानी महात्मा नाम- रूपसे रहित होकर उत्तम-से-उत्तम दिव्य परम पुरुष परमात्माको प्राप्त हो जाता है।' इससे यह सिद्ध होता है कि उक्त प्रकरणमें जो जीवात्मा और मुख्य प्राणका वर्णन हुआ है, वह सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति और प्रलयका कारण केवल परब्रह्मको बतानेके लिये ही है। ऐसा औडुलोमि आचार्य मानते हैं। सम्बन्ध—अब काशकृत्स्न आचार्यका मत उपस्थित करते हैं— अवस्थितेरिति काशकृत्स्नः॥ १।४।२२॥ अवस्थितेः=प्रलयकालमें सम्पूर्ण जगत्की स्थिति उस परमात्मामें ही होती है, इसलिये (उक्त प्रकरणमें जीव और मुख्य प्राणका वर्णन परब्रह्मको जगत्का कारण सिद्ध करनेके लिये ही है)। इति=ऐसा; काशकृत्स्नः= काशकृत्स्न आचार्य मानते हैं। व्याख्या—काशकृत्स्न आचार्यका कहना है कि प्रलयकालमें सम्पूर्ण जगत्की स्थिति परमात्मामें ही बतायी गयी है (प्र० उ० ४।११),* इससे भी यही सिद्ध होता है कि उक्त प्रसंगमें जो सुषुप्तिकालमें प्राण और
- विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र।