वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextसूत्र २५ ] अध्याय २ १५७ शक्तिसे ही जगत्की रचना करता है। श्रुति परमेश्वरकी उस अचिन्त्य शक्तिका वर्णन इस प्रकार करती है—'उस परमात्माको किसी साधनकी आवश्यकता नहीं है, उसके समान और उससे बढ़कर भी कोई नहीं देखा जाता है। उसकी ज्ञान, बल और क्रियारूप स्वाभाविक पराशक्ति नाना प्रकारकी ही सुनी जाती है।' (श्वेता० ६।८)१ सम्बन्ध— यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'दूध-जल आदि जड वस्तुओंमें तो इस प्रकारका परिणाम होना सम्भव है, क्योंकि उसमें संकल्पपूर्वक विचित्र रचना करनेकी प्रवृत्ति नहीं देखी जाती; परंतु ब्रह्म तो ईक्षण (संकल्प या विचार)- पूर्वक जगत्की रचना करता है, अतः उसके लिये दूधका दृष्टान्त देना ठीक नहीं है। जो लोग सोच-विचारकर कार्य करनेवाले हैं ऐसे लोगोंको साधन- सामग्रीकी आवश्यकता होती ही है। ब्रह्म अद्वितीय होनेके कारण साधनशून्य है, इसलिये वह जगत्का कर्ता कैसे हो सकता है?' इसपर कहते हैं— देवादिवदपि लोके॥ २। १। २५॥ लोके=लोकमें; देवादिवत्=देवता आदिकी भाँति; अपि=(बिना उपकरणके) भी (कार्य करनेकी शक्ति देखी जाती है)। व्याख्या—जैसे लोकमें देवता और योगी आदि बिना किसी उपकरणकी सहायताके अपनी अद्भुत शक्तिके द्वारा ही बहुत-से शरीर आदिकी रचना कर लेते हैं; बिना किसी साधन-सामग्रीके संकल्पमात्रसे मनोवांछित विचित्र पदार्थोंको प्रकट कर लेते हैं२, उसी प्रकार अचिन्त्यशक्तिसम्पन्न परमेश्वर अपने संकल्पमात्रसे यदि जड-चेतनके समुदायरूप विचित्र जगत्की रचना कर दे या स्वयं उसके रूपमें प्रकट हो जाय तो क्या आश्चर्य है। साधारण मकड़ी भी अपनी ही शक्तिसे अन्य साधनोंके बिना ही जाला बना लेती है, तब सर्वशक्तिमान् १-यह मन्त्र सूत्र १। १। २ की टिप्पणीमें आ गया है। २-देखिये वाल्मीकिरामायण तथा रामचरितमानसमें भरद्वाजजीके द्वारा भरतके आतिथ्यसत्कारका प्रसंग।