वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context१६० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ शब्दोंमें वर्णन किया है। अतः ब्रह्मको जगत्का कारण माननेमें पूर्वोक्त दोनों ही दोष नहीं प्राप्त होते हैं। सम्बन्ध— इसी बातको युक्तिसे भी दृढ़ करते हैं— आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि॥२।१।२८॥ च=इसके सिवा (युक्तिसे भी इसमें कोई विरोध नहीं है), हि=क्योंकि; आत्मनि=(अवयवरहित) जीवात्मामें; च=भी; एवम्=ऐसी; विचित्राः=विचित्र सृष्टियाँ (देखी जाती हैं)। व्याख्या—पूर्व सूत्रमें ब्रह्मके विषयमें केवल श्रुति-प्रमाणकी गति बतायी गयी, सो तो है ही, उसके सिवा, विचार करनेपर युक्तिसे भी यह बात समझमें आ सकती है कि अवयवरहित परब्रह्मसे इस विचित्र जगत्का उत्पन्न होना असंगत नहीं है; क्योंकि स्वप्नावस्थामें इस अवयवरहित निर्विकार जीवात्मासे नाना प्रकारकी विचित्र सृष्टि होती देखी जाती है; यह सबके अनुभवकी बात है। योगी लोग भी स्वयं अपने स्वरूपसे अविकृत रहते हुए ही अनेक प्रकारकी रचना करते हुए देखे जाते हैं। महर्षि विश्वामित्र, च्यवन, भरद्वाज, वसिष्ठ तथा उनकी धेनु नन्दिनी आदिमें अद्भुत सृष्टि-रचनाशक्तिका वर्णन इतिहासपुराणोंमें जगह-जगह पाया जाता है। जब ऋषि-मुनि आदि विशिष्ट जीवकोटिके लोग भी स्वरूपसे अविकृत रहकर विचित्र सृष्टि-निर्माणमें समर्थ हो सकते हैं, तब परब्रह्ममें ऐसी शक्तिका होना तो कोई आश्चर्यकी बात ही नहीं है। विष्णुपुराणमें प्रश्न और उत्तरके द्वारा इस बातको बहुत अच्छी तरह समझाया गया है।* * निर्गुणस्याप्रमेयस्य शुद्धस्याप्यमलात्मनः। कथं सर्गादिकर्तृत्वं ब्रह्मणोऽभ्युपगम्यते॥ (वि० पु० १।३।१) मैत्रेय पूछते हैं—‘मुने! जो ब्रह्म निर्गुण, अप्रमेय, शुद्ध और निर्मलात्मा है, उसे सृष्टि आदिका कर्ता कैसे माना जा सकता है?’