वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context१६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या—वह परमात्मा सब शक्तियोंसे सम्पन्न है, ऐसी बात वेदमें जगह-जगह कही गयी है। जैसे—'सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ॥' (छा० उ० ३।१४।२) अर्थात् 'वह ब्रह्म सत्यसंकल्प, आकाशस्वरूप, सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, समस्त जगत्को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाणीरहित और मानरहित है।' यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः। तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते॥ (मु० उ० १।१।९) 'जो सर्वज्ञ, सबको जाननेवाला है, जिसका ज्ञानमय तप है, उसी परमेश्वरसे यह विराट्-रूप जगत् और नाम, रूप तथा अन्न उत्पन्न होते हैं।' तथा उस परब्रह्मके शासनमें सूर्य-चन्द्रमा आदिको दृढ़तापूर्वक स्थित बताया जाना (बृ० उ० ३।८।९), उसमें ज्ञान, बल और क्रियारूप नाना प्रकारकी स्वाभाविक शक्तियोंका होना (श्वेता० ६।८)*, जगत्के कारणका अनुसंधान करनेवाले महर्षियोंद्वारा उस परमात्मदेवकी आत्मभूता शक्तिका दर्शन करना (श्वेता० १।३) इत्यादि प्रकारसे परब्रह्मकी शक्तियोंको सूचित करनेवाले बहुत-से वचन वेदमें मिलते हैं जिनका उल्लेख पहले भी हो चुका है। इस तरह अनेक विचित्र शक्तियोंसे सम्पन्न होनेके कारण उस परब्रह्म परमात्मासे इस विचित्र जगत्का उत्पन्न होना अयुक्त नहीं है। श्रुतिमें जो ब्रह्मको अवयवरहित बताया गया है, वह उसके स्वरूपकी अखण्डता बतलानेके उद्देश्यसे है, उसकी शक्तिरूप अंशोंके निषेधमें उसका अभिप्राय नहीं है; इसलिये परमात्मा ही इस जगत्का कारण है, यही मानना ठीक है। सम्बन्ध—पुनः शंका उठाकर उसका निराकरण करते हैं—
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