वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context१८४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ अपरिग्रहाच्चात्यन्तमनपेक्षा ॥ २ । २ । १७ ॥ अपरिग्रहात् = परमाणुकारणवादको शिष्ट पुरुषोंने ग्रहण नहीं किया है, इसलिये; च = भी; अत्यन्तम् अनपेक्षा = इसकी अत्यन्त उपेक्षा करनी चाहिये। व्याख्या — पूर्वोक्त प्रधानकारणवादमें अंशतः सत्कार्यवादका निरूपण है। अतः उस सत्कार्यवादरूप अंशको मनु आदि शिष्ट पुरुषोंने ग्रहण किया है, परंतु इस परमाणुकारणवादको तो किसी भी श्रेष्ठ पुरुषने स्वीकार नहीं किया है, अतः यह सर्वथा उपेक्षणीय है। सम्बन्ध — ग्यारहवेंसे सत्रहवेंतक सात सूत्रोंमें परमाणुवादका खण्डन किया गया। अब क्षणिकवादका निराकरण करनेके लिये यह प्रकरण आरम्भ करते हैं— समुदाये उभयहेतुकेऽपि तदप्राप्तिः ॥ २ । २ । १८ ॥ उभयहेतुके = परमाणुहेतुक बाह्य समुदाय और स्कन्धहेतुक आभ्यन्तर समुदाय ऐसे दो प्रकारके; समुदाये = समुदायको स्वीकार कर लेनेपर; अपि = भी; तदप्राप्तिः = उस समुदायकी प्राप्ति (सिद्धि) नहीं होती है। व्याख्या — बौद्धमतके अनुयायी परस्पर किंचित् मतभेदको लेकर चार श्रेणियोंमें विभक्त हो गये हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—वैभाषिक, सौत्रान्तिक, योगाचार तथा माध्यमिक। इनमें वैभाषिक और सौत्रान्तिक ये दोनों बाह्य पदार्थोंकी सत्ता स्वीकार करते हैं। दोनोंमें अन्तर इतना ही है कि वैभाषिक प्रत्यक्ष दीखनेवाले बाह्य पदार्थोंका अस्तित्व मानता है और सौत्रान्तिक विज्ञानसे अनुमित बाह्य पदार्थोंकी सत्ता स्वीकार करता है। वैभाषिकके मतमें घट आदि बाह्य पदार्थ प्रत्यक्ष प्रमाणके विषय हैं। सौत्रान्तिक घट आदिके रूपमें उत्पन्न विज्ञानको ही प्रत्यक्ष मानता है और उसके द्वारा घटादि पदार्थोंकी सत्ताका अनुमान करता है। योगाचारके मतमें ‘निरालम्ब विज्ञान’ मात्रकी ही सत्ता है, बाह्य पदार्थ स्वप्नमें देखी जानेवाली वस्तुओंकी भाँति मिथ्या है। माध्यमिक सबको शून्य ही मानता है। उसके मतमें दीपशिखाकी भाँति संस्कारवश क्षणिक विज्ञानकी धारा ही बाह्य पदार्थोंके रूपमें प्रतीत होती है। जैसे