वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextसूत्र २५ ] अध्याय २ १९१ होता है। पृथिवी गन्धका, जल रसका, तेज रूपका तथा वायु स्पर्शका आश्रय है; इसी प्रकार शब्दका भी कोई आश्रय होना चाहिये। आकाश ही उसका आश्रय है; आकाशमें ही शब्दका श्रवण होता है। यदि आकाश न हो तो शब्दका श्रवण ही नहीं हो सकता। प्रत्येक वस्तुके लिये आधार और अवकाश (स्थान) चाहिये। आकाश ही शेष चार भूतोंका आधार है तथा वही सम्पूर्ण जगत्को अवकाश देता है। इससे भी आकाशकी सत्ता प्रत्यक्ष है। पक्षी आकाशमें चलनेके कारण ही खग या विहंग कहलाते हैं। कोई भी भाव-पदार्थ अभावमें नहीं विचरण करता है। श्रुतिने परमात्मासे आकाशकी उत्पत्ति स्पष्ट शब्दोंमें स्वीकार की है—‘आत्मन आकाशः सम्भूतः।' (तै० उ० २। १) इस प्रकार युक्ति तथा प्रमाणसे भी आकाशकी सत्ता सिद्ध है; कोई ऐसा विशेष कारण नहीं है, जिससे आकाशको भावरूप न माना जा सके। अतः आकाशकी अभावरूपता किसी प्रकार सिद्ध न होनेके कारण बौद्धोंकी मान्यता युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध— बौद्धोंके मतमें 'आत्मा' भी नित्य वस्तु नहीं, क्षणिक है; अतः उनकी इस मान्यताका खण्डन करते हुए कहते हैं— अनुस्मृतेश्च ॥ २। २। २५ ॥ अनुस्मृतेः = पहलेके अनुभवोंका बारम्बार स्मरण होता है, (इसलिये अनुभव करनेवाला आत्मा क्षणिक नहीं है) इस युक्तिसे; च= भी (बौद्धमत असंगत सिद्ध होता है)। व्याख्या—सभी मनुष्योंको अपने पहले किये हुए अनुभवोंका बारम्बार स्मरण होता है। जैसे 'मैंने अमुक दिन अमुक ग्राममें अमुक वस्तु देखी थी, मैं बालकपनमें अमुक खेल खेला करता था। मैंने आजसे बीस वर्ष पहले जिसे देखा था, वही यह है' इत्यादि। इस प्रकार पूर्व अनुभवोंका जो बारम्बार स्मरण होता है, उसे 'अनुस्मृति' कहते हैं। यह तभी हो सकती है, जब कि अनुभव करनेवाला आत्मा नित्य माना जाय। उसे क्षणिक माननेसे यह स्मरण