वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextसूत्र २७-२८ ] अध्याय २ १९३ उदासीनानामपि चैवं सिद्धिः ॥ २ । २ । २७ ॥ च=इसके सिवा; एवम्=इस प्रकार (बिना कर्ताके स्वतः कार्यकी उत्पत्ति) माननेपर; उदासीनानाम्=उदासीन (कार्य-सिद्धिके लिये चेष्टा न करनेवाले) पुरुषोंका; अपि=भी; सिद्धिः=कार्य सिद्ध हो सकता है। व्याख्या—यदि ऐसा माना जाय कि 'कार्यकी उत्पत्ति होनेमें किसी नित्य चेतन कर्ताकी आवश्यकता नहीं है, क्षणिक पदार्थोंके समुदायसे अपने- आप कार्य उत्पन्न हो जाता है,' तब तो जो लोग उदासीन रहते हैं, कार्य आरम्भ नहीं करते या उसकी सिद्धिकी चेष्टासे विरत रहते हैं, उनके कार्य भी पदार्थगत शक्तिसे अपने-आप सिद्ध हो जाने चाहिये। परंतु ऐसा नहीं देखा जाता। इससे यही सिद्ध होता है कि उपर्युक्त मान्यता समीचीन नहीं है। सम्बन्ध—यहाँतक बौद्धोंके क्षणिकवादका खण्डन किया गया। अब विज्ञानवादका खण्डन करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। विज्ञानवादी बौद्ध (योगाचार) मानते हैं कि प्रतीत होनेवाला बाह्य पदार्थ वास्तवमें कुछ नहीं है, केवलमात्र स्वप्नकी भाँति बुद्धिकी कल्पना है; इस मान्यताका खण्डन करते हैं— नाभाव उपलब्धेः ॥ २ । २ । २८ ॥ अभावः=जाननेमें आनेवाले पदार्थोंका अभाव; न=नहीं है; उपलब्धेः= क्योंकि उनकी उपलब्धि होती है। व्याख्या—जाननेमें आनेवाले बाह्य पदार्थ मिथ्या नहीं हैं, वे कारणरूपमें तथा कार्यरूपमें भी सदा ही सत्य हैं। इसलिये उनकी प्रत्यक्ष उपलब्धि होती है। यदि वे स्वप्नगत पदार्थों तथा आकाशमें दीखनेवाली नीलिमा आदिकी भाँति सर्वथा मिथ्या होते तो इनकी उपलब्धि नहीं होती। सम्बन्ध—विज्ञानवादियोंकी ओरसे यह कहा जा सकता है कि 'उपलब्धिमात्रसे पदार्थकी सत्ता सिद्ध नहीं हो सकती; क्योंकि स्वप्नमें प्रतीत होनेवाले तथा बाजीगरद्वारा उपस्थित किये जानेवाले पदार्थ यद्यपि सत्य नहीं होते तो भी इनकी उपलब्धि देखी जाती है, इसपर कहते हैं—