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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished486 pages

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२१२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या—उपर्युक्त प्रकारसे दोनों श्रुतियोंके कथनकी एकता होनेसे यह समझना चाहिये कि उक्त तेजसे जल उत्पन्न हुआ। सम्बन्ध—इस प्रकरणमें यह कहा गया है कि उस जलने अन्नको रचा, अतः यहाँ गेहूँ, जौ आदि अन्नकी उत्पत्ति जलसे हुई या पृथिवीसे ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— पृथिव्यधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः ॥ २ । ३ । १२ ॥ पृथिवी=(इस प्रकरणमें अन्नके नामसे) पृथिवी ही कही गयी है; अधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः=क्योंकि पाँचों तत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रकरण है, उसमें बताया हुआ काला रूप भी पृथिवीका ही माना गया है तथा दूसरी श्रुतिमें भी जलसे पृथिवीकी ही उत्पत्ति बतायी गयी है। व्याख्या—इस प्रकरणमें अन्न शब्द पृथिवीका ही बोधक है, ऐसा समझना ठीक है; क्योंकि यह तत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रकरण है तथा जो अन्नका रूप काला बताया गया है, वह भी अन्नका रूप नहीं है, पृथिवीका ही रूप काला माना गया है। इसके सिवा, तैत्तिरीयोपनिषद्में जहाँ इस क्रमका वर्णन है वहाँ भी जलसे पृथिवीका उत्पन्न होना बताया गया है, उसके बाद पृथिवीसे ओषधि और ओषधिसे अन्नकी उत्पत्तिका वर्णन है*। इसीलिये यहाँ सीधे जलसे ही अन्नकी उत्पत्ति मानना ठीक नहीं है। छान्दोग्यके उक्त प्रकरणमें जो यह बात कही गयी है कि ‘यत्र क्व च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवति।’ (६।२।४) अर्थात् ‘जहाँ-जहाँ जल अधिक बरसता है, वहीं अन्नकी उत्पत्ति अधिक होती है।’ इसका भी यही भाव है कि जलके सम्बन्धमें पृथिवीमें पहले ओषधि अर्थात् अन्नका पौधा उत्पन्न होता है और उससे अन्न उत्पन्न होता है; ऐसा माननेपर पूर्वापरमें कोई विरोध नहीं रहेगा। सम्बन्ध—इस प्रकरणमें आकाशकी उत्पत्ति साक्षात् ब्रह्मसे बतायी गयी है और अन्य चार तत्त्वोंमें एकसे दूसरेकी क्रमशः उत्पत्ति बतायी है। अतः यह जिज्ञासा होती है कि एक तत्त्वके बाद दूसरे तत्त्वकी रचना

  • देखिये पृष्ठ २०७ की टिप्पणी।