वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context२३० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ गया है, वह उसकी सूक्ष्मताका बोधक है, न कि एकदेशिता (छोटेपन)- का; और उसको जो अंगुष्ठमात्र कहा गया है, वह मनुष्य-शरीरके हृदयके मापके अनुसार कहा गया है तथा उसे जो छोटे आकारवाला बताया गया है, वह भी संकीर्ण अन्तःकरणके सम्बन्धसे है, वास्तवमें वह विभु (समस्त जड पदार्थोंमें व्याप्त) और अनन्त (देश-कालकी सीमासे अतीत है)। सम्बन्ध—सांख्यमतमें जड प्रकृतिको स्वतन्त्र कर्ता माना गया है और पुरुषको असंग माना गया है, किंतु जड प्रकृतिको स्वभावसे कर्ता मानना युक्तिसंगत नहीं है तथा पुरुष असंग होनेसे उसको भी कर्ता मानना नहीं बन सकता। अतः यह निश्चय करनेके लिये कि कर्ता कौन है, अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। वहाँ गौणरूपसे 'जीवात्मा कर्ता है' यह बात सिद्ध करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं— कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात्॥ २। ३। ३३॥ कर्ता=कर्ता जीवात्मा है; शास्त्रार्थवत्त्वात्=क्योंकि विधि-निषेधबोधक शास्त्रकी इसीमें सार्थकता है। व्याख्या—श्रुतियोंमें जो बार-बार यह कहा गया है कि अमुक काम करना चाहिये, अमुक नहीं करना चाहिये। अमुक शुभ कर्म करनेवालेको अमुक श्रेष्ठ फल मिलता है, अमुक पापकर्म करनेवालेको अमुक दुःख भोग करना पड़ता है, इत्यादि; यह जो शास्त्रका कथन है; वह किसी चेतनको कर्ता न माननेसे और जड प्रकृतिको कर्ता माननेसे भी व्यर्थ होता है; किंतु शास्त्र-वचन कभी व्यर्थ नहीं हो सकता। इसलिये जीवात्माको ही समस्त कर्मोंका कर्ता मानना उचित है। इसके सिवा, श्रुति स्पष्ट शब्दोंमें जीवात्माको कर्ता बतलाती है;* यहाँ यह ध्यानमें रखना चाहिये कि अनादिकालसे जो जीवात्माका कारण-शरीरके साथ सम्बन्ध है उसीसे जीवको कर्ता माना गया
- एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः। (प्र० उ० ४। ९)